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                <title>धर्म संस्कृति - Gambheer Samachar</title>
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                <title>श्री काशी विश्वनाथ सेवा समिति द्वारा पूर्णिमा 2026 </title>
                                    <description><![CDATA[<p>श्री काशी विश्वनाथ सेवा समिति के सभापति श्री विवेक गुप्ता के दिशा अनुशार अंतिम दिन पूर्णिमा 2026 श्रावण मेला सेवाकार्य आज संपूर्ण हुआ। इस वर्ष कांवड़ियों की भारी भीड़, पिछले वर्ष से लगभग दुगनी थी (लगभग चार लाख कांवड़िया प्रत्येक सप्ताह), कांवड़ियों की निःशुल्क सेवा 17 जुलाई से 28 अगस्त प्रतेक दिन की गयी। सभी कार्यकर्ता एवं सहयोगी संस्थाओ बड़ी लगन एवं परिश्रम से रात-दिन अति सुंदर कार्य कर श्रावण मेला को सफल बनाया । सहयोगी संस्थाओ का भी सेवा में योगदान रहा जिनमे सोसाईटी बेनिफिट सर्कल, श्री राणीसती प्रचार समिति, स्वतंत्र भारत बालचर मंडल , पटेल पाटीदार सेवा समाज,</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.gambheersamachar.in/religion-culture/successful-completion-of-purnima-2026-shravan-mela-kanwariya-sevakari-by/article-3547"><img src="https://www.gambheersamachar.in/media/400/2026-08/whatsapp-image-2026-08-28-at-5.16.23-pm1.jpeg" alt=""></a><br /><p>श्री काशी विश्वनाथ सेवा समिति के सभापति श्री विवेक गुप्ता के दिशा अनुशार अंतिम दिन पूर्णिमा 2026 श्रावण मेला सेवाकार्य आज संपूर्ण हुआ। इस वर्ष कांवड़ियों की भारी भीड़, पिछले वर्ष से लगभग दुगनी थी (लगभग चार लाख कांवड़िया प्रत्येक सप्ताह), कांवड़ियों की निःशुल्क सेवा 17 जुलाई से 28 अगस्त प्रतेक दिन की गयी। सभी कार्यकर्ता एवं सहयोगी संस्थाओ बड़ी लगन एवं परिश्रम से रात-दिन अति सुंदर कार्य कर श्रावण मेला को सफल बनाया । सहयोगी संस्थाओ का भी सेवा में योगदान रहा जिनमे सोसाईटी बेनिफिट सर्कल, श्री राणीसती प्रचार समिति, स्वतंत्र भारत बालचर मंडल , पटेल पाटीदार सेवा समाज, नव जागृति संघ , सहयोगी समिति मोमिनपुर , श्री नमो नारायणी सेवा संस्थाओ एवं इनके कार्यकर्ताओं के सहयोग से श्रावण में सेवा कार्य सफल हो पाया। इस कार्यक्रम मे समिती के उपसभापति श्री कमला प्रसाद काजरीया एवं श्री शिव रतन गेयका के सहयोग से एव समिती प्रांगण मे उपस्थित प्रधान सचिव श्री बिमल दीवान ने मेला संयोजक एव उपसचिव श्री पवन बंसल, श्री सुभाष सवालदवाला, मेला संयोजक श्री मनोज चौधरी,  मेला सह संयोजक श्री मनीष धानुका ,श्री गिरधारीलाल अग्रवाल ,श्री आदित्य तुल्शियान, सुभाष गोयनका तथा समिति के अन्य अधिकारी एवं मेला सदस्य आनंद दीवान, उमाशकर जोशी, बानी पढ़ दास, जय प्रकाश गुप्ता, चुन्नी लाल पटेल ,दीपक जालान ,दुर्शी चंद अग्रवाल, महाबीर नारनोली, महेश पंचलंगिया, मोहित सुरेखा, प्रदीप गोयनका, महेश गोयनका, अन्नू  मिश्रा, प्रवीण जालान, महेश काबरा, सुमित झुनझुनवाला,  ताड़कनाथ गुप्ता, राज कुमार टिबरेवाल, रमेश गुप्ता, शैलेन्द्र कुमार गुप्ता, सुशील जोशी, दीपक अग्रवाल (दिल्ली), संजय अग्रवाल(पोस्ता),आदित्य दीवान, शैलेंद्र कुमार गुप्ता, बिनोद अग्रवाल,संजय अग्रवाल (निम का थाना ), विनय सोंथालिया, कार्यकर्ताओं का सहयोग सराहनीय रहा। कुछ दान दाता ऐसे भी है जिन्होंने गुप्त दान दिया अपना नाम कँही भी नहीं लिखवाने दिए ऐसे दाता सेवा करने वाला राजा दानवीर कर्ण के सामान है, जो दानवीर दाताओं ने अपना आर्थिक सहयोग एवं सामान दिया उन दाताओं के बिना ये श्रावणी मेला कांवड़िया सेवा करना असम्भव था, समिती परिवार उन सभी दाताओं एवं सहयोगियों का अभारी रहेगा ।<br />समिति परिवार</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्थानीय</category>
                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 28 Aug 2026 17:22:58 +0530</pubDate>
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                <title>तारकेश्वर धाम के मार्ग में श्रावण माह के अवसर पर निःशुल्क चिकित्सा शिविर का वृहत आयोजन संपन्न</title>
                                    <description><![CDATA[<p><br /><em><strong>कोलकाता,</strong></em> २८अगस्त २०२६, शुक्रवार, अपने चिकित्सा क्षेत्र के सेवा कार्यों को गतिशील रखते हुए कोलकाता के अति विशिष्ट सामाजिक संस्था, सोसायटी बेनिफिट सर्किल ने श्रावण माह के शुभावसर पर कावंड़ियों के सेवार्थ निःशुल्क चिकित्सा शिविर का ६ सप्ताह व्यापी वृहत आयोजन संपन्न किया। ज्ञात रहे की श्रावण माह के अवसर पर सेवरापुली से तारकेश्वर धाम तक ( करीब ४२ किलोमीटर )  कांवड़ लेकर जल यात्री पैदल चलते हैं। इस मार्ग पर कांवड़ियों के सहायता हेतु प्राथमिक चिकित्सा की अति आवश्यकता होती है। इसी मार्ग पर हरिपाल अंचल के माल्या स्टेशन के निकट श्री काशी विश्वनाथ सेवा समिति का विश्रामस्थल स्थित</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.gambheersamachar.in/religion-culture/on-the-occasion-of-shravan-month-a-massive-free-medical/article-3532"><img src="https://www.gambheersamachar.in/media/400/2026-08/whatsapp-image-2026-08-28-at-11.14.37-am.jpeg" alt=""></a><br /><p><br /><em><strong>कोलकाता,</strong></em> २८अगस्त २०२६, शुक्रवार, अपने चिकित्सा क्षेत्र के सेवा कार्यों को गतिशील रखते हुए कोलकाता के अति विशिष्ट सामाजिक संस्था, सोसायटी बेनिफिट सर्किल ने श्रावण माह के शुभावसर पर कावंड़ियों के सेवार्थ निःशुल्क चिकित्सा शिविर का ६ सप्ताह व्यापी वृहत आयोजन संपन्न किया। ज्ञात रहे की श्रावण माह के अवसर पर सेवरापुली से तारकेश्वर धाम तक ( करीब ४२ किलोमीटर )  कांवड़ लेकर जल यात्री पैदल चलते हैं। इस मार्ग पर कांवड़ियों के सहायता हेतु प्राथमिक चिकित्सा की अति आवश्यकता होती है। इसी मार्ग पर हरिपाल अंचल के माल्या स्टेशन के निकट श्री काशी विश्वनाथ सेवा समिति का विश्रामस्थल स्थित है, जहां प्रति सप्ताह लाखों की संख्या में कांवड़िए विश्राम का लाभ उठाते हैं। इसी विश्रामस्थल के प्रांगण में हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी सोसाइटी बेनिफिट सर्किल ने  अपने चिकित्सालय में, एवं विश्रामस्थल के अंदर दो स्थानों में निःशुल्क प्राथमिक चिकित्सा का आयोजन किया। जिसमें ३८२७२  कांवड़ियों की चिकित्सा सेवा की गई। इस वर्ष ज्ञात हो कि अति भीषण  गर्मी एवं भीड़ के कारण काफी संख्या में क्रिटिकल मरीज शिविर में लाये गए एवं बाबा ताड़कनाथ की महती कृपा से सभी स्वस्थ हुवे। संस्था के सभापति बिमल दीवान सेवा कार्यों में तन मन धन से लिप्त रहते हैं। उनके साथ संस्था के अध्यक्ष पवन बंसल के नेतृत्व में प्रधान सचिव आदित्य विक्रम तुलस्यान, कोषाध्यक्ष  संजय अग्रवाल (नीम का थाना), सुभाष चंद्र गोयनका, मनीष धानुका, सुभाष सावलदावाला, दुर्शी चंद्र अग्रवाल,मोहित सुरेका, मनोज चौधरी, महेश काबरा, सुमित झुनझुनवाला, प्रवीण जालान, महेश गोयनका, विनय संथालिया, चुन्नी लाल पटेल (मामू), सचिन अग्रवाल, अनु मिश्रा, सुशील जोशी, महेश पंचलांगिया, दीपक जालान, प्रदीप गोयनका, महेश बंका, संजय   थरड आदि ने शिविर को सफल बनाने में तन मन धन से अपनी पूर्ण भागीदारी निभाई। इनके साथ महिला विंग के मोना बंसल, आशा  अग्रवाल, राधिका काबरा, संजुक्ता, नम्रता एवं अनुमिता ने अपनी उपस्थिति एवं सहयोगियों से सबका उत्साह वर्धन किया। साथ ही चिकित्सक टीम कौशिक साहू एवं अंजलि प्रधान के नेतृत्व में दिन रात एक कर सेवा का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया। इस शिविर के साथ साथ संस्था प्रत्येक माह की भांति ११८ चश्मों का निःशुल्क वितरण भी किया। जो ग्रामीण क्षेत्र के जरूरतमंदों के लिए अति लाभदायक रहती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्थानीय</category>
                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 28 Aug 2026 15:29:36 +0530</pubDate>
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                <title>पत्नी भी पति को बांध सकती है राखी</title>
                                    <description><![CDATA[<p><br /><strong><em>निज संवाददाता</em></strong> : रक्षाबंधन का नाम सुनते ही मिठाइयों की थाली, रेशमी धागे और भाइयों से तोहफ़े पाने के लिए बहन की प्यारी ज़िद याद आ जाती है। लेकिन, अगर आपकी पत्नी अचानक मिठाई की थाली और राखी लेकर आपके पास आए, तो हैरान होने की ज़रूरत नहीं है। आजकल पति को राखी बांधने का रिवाज़ काफ़ी लोकप्रिय हो रहा है।  पत्नियां अक्सर अपने पतियों को यह पवित्र धागा बांधती हुई देखी जाती हैं। बेशक,  पति को सुरक्षा का धागा बांधने का यह चलन नया नहीं है—यह बहुत समय से चला आ रहा है।<br />हम अक्सर मानते हैं कि राखी</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.gambheersamachar.in/religion-culture/wife-can-also-tie-rakhi-to-her-husband/article-3475"><img src="https://www.gambheersamachar.in/media/400/2026-08/whatsapp-image-2026-08-19-at-2.02.41-pm.jpeg" alt=""></a><br /><p><br /><strong><em>निज संवाददाता</em></strong> : रक्षाबंधन का नाम सुनते ही मिठाइयों की थाली, रेशमी धागे और भाइयों से तोहफ़े पाने के लिए बहन की प्यारी ज़िद याद आ जाती है। लेकिन, अगर आपकी पत्नी अचानक मिठाई की थाली और राखी लेकर आपके पास आए, तो हैरान होने की ज़रूरत नहीं है। आजकल पति को राखी बांधने का रिवाज़ काफ़ी लोकप्रिय हो रहा है।  पत्नियां अक्सर अपने पतियों को यह पवित्र धागा बांधती हुई देखी जाती हैं। बेशक,  पति को सुरक्षा का धागा बांधने का यह चलन नया नहीं है—यह बहुत समय से चला आ रहा है।<br />हम अक्सर मानते हैं कि राखी सिर्फ़ भाई-बहन का त्योहार है। लेकिन हिंदू धर्मग्रंथ कुछ और ही कहते हैं। धर्मग्रंथों के अनुसार, रक्षा-सूत्र (सुरक्षा का धागा) सुरक्षा और स्नेह का एक शक्तिशाली प्रतीक है।  इसका महत्व भाई-बहन के रिश्ते से कहीं ज़्यादा है। भविष्य पुराण की एक कहानी पर गौर करें: देवताओं और राक्षसों के बीच भीषण युद्ध के दौरान, देवताओं के राजा इंद्र मुश्किल में पड़ गए थे। अपने पति की जीत और सुरक्षा के लिए चिंतित, देवी इंद्राणी ने उनकी कलाई पर एक विशेष सुरक्षा धागा बांधा। उसी धागे की शक्ति और आशीर्वाद से इंद्र विजयी हुए। दूसरे शब्दों में, पौराणिक कथाओं से पता चलता है कि देवताओं के राजा ने ही सबसे पहले अपनी पत्नी से राखी बंधवाई थी!<br />शादी में सुरक्षा का संकल्प<br />शादी के बंधन में पति और पत्नी एक-दूसरे के पूरक होते हैं; वे एक-दूसरे के रक्षक होते हैं। इसलिए, पत्नी का अपने पति की लंबी उम्र,  अच्छे स्वास्थ्य और सफलता की कामना करते हुए उन्हें राखी बांधने में धर्मग्रंथों के अनुसार कोई आपत्ति नहीं है। इस रिवाज़ को निभाने से पति-पत्नी के बीच सम्मान और प्यार का रिश्ता और गहरा हो सकता है। <br />साल 2026 में राखी पूर्णिमा का त्योहार शुक्रवार, 28 अगस्त को मनाया जाएगा। शास्त्रों के अनुसार, भद्रा काल (अशुभ समय) सूर्योदय से पहले ही खत्म हो जाएगा;  इसलिए, पूजा-पाठ और रस्मों के लिए शुभ समय सुबह से ही शुरू हो जाएगा।<br />तिथि (चंद्र दिवस) की शुरुआत: 27 अगस्त को सुबह 9:08 बजे।<br />तिथि की समाप्ति: 28 अगस्त को सुबह 9:48 बजे।<br />शुभ समय: 28 अगस्त, सुबह 5:57 बजे से सुबह 9:48 बजे तक (कुल समय: 3 घंटे 51 मिनट)।<br />मालूम हो कि , इसी दिन साल का आखिरी चंद्र ग्रहण भी लगने वाला है। यह ग्रहण सुबह 6:53 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक रहेगा। हालांकि, अच्छी खबर यह है कि यह ग्रहण भारत में दिखाई नहीं देगा। इसलिए, सूतक काल (धार्मिक नियमों और पाबंदियों का समय) का पालन करने की ज़रूरत नहीं होगी। आप पूरी निश्चिंतता के साथ अपने पति की कलाई पर पवित्र धागा (रक्षा सूत्र) बांध सकती हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 20 Aug 2026 14:58:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Gambheer Samachar ]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>महिलाओं का उत्सव है तीज</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">तीज का उत्सव श्रावण मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। यह महिलाओं का उत्सव है। सावन में जब सम्पूर्ण प्रकृति हरी ओढ़नी से आच्छादित होती है उस अवसर पर महिलाओं के मन मयूर नृत्य करने लगते हैं। वृक्ष की शाखाओं में झूले पड़ जाते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश में इसे कजली तीज के रूप में मनाते हैं। सुहागन स्त्रियों के लिए यह व्रत बहुत महत्व रखता है। आस्था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उमंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सौंदर्य और प्रेम का यह उत्सव शिव-पार्वती के पुनर्मिलन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। चारों ओर हरियाली होने के कारण इसे हरियाली तीज कहते</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.gambheersamachar.in/religion-culture/teej-is-a-festival-of-women/article-3438"><img src="https://www.gambheersamachar.in/media/400/2026-08/image1.png" alt=""></a><br /><p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">तीज का उत्सव श्रावण मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। यह महिलाओं का उत्सव है। सावन में जब सम्पूर्ण प्रकृति हरी ओढ़नी से आच्छादित होती है उस अवसर पर महिलाओं के मन मयूर नृत्य करने लगते हैं। वृक्ष की शाखाओं में झूले पड़ जाते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश में इसे कजली तीज के रूप में मनाते हैं। सुहागन स्त्रियों के लिए यह व्रत बहुत महत्व रखता है। आस्था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उमंग</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सौंदर्य और प्रेम का यह उत्सव शिव-पार्वती के पुनर्मिलन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। चारों ओर हरियाली होने के कारण इसे हरियाली तीज कहते हैं। इस अवसर पर महिलाएं झूला झूलती हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोकगीत गाती हैं और आनन्द मनाती हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">सौंदर्य</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम के उत्सव और आस्था के इस व्रत का महिलाओं के लिए बड़ा महत्व है</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">विशेष रूप से नव विवाहिताओं के लिए। यह त्योहार मुख्य रूप से उत्तर भारत (राजस्थान</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">मध्य प्रदेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">उत्तर पदेश</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">बिहार और झारखंड) में धूमधाम से मनाया जाता है। परंपरा के अनुसार नवविवाहिताएं पहला व्रत मायके में रखती हैं और इसके लिए झूले सजाए जाते हैं</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लोक गीत गाए जाते हैं। देश के कई हिस्सों में मेले लगते हैं और माता पार्वती की सवारी निकाली जाती है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">वर्षा ऋतु में श्रावण के महीने में हमारे देश में चारों तरफ पानी बरसता रहता है। इस दौरान चारों तरफ हरियाली ही हरियाली नजर आती है। हरियाली के आगोश में प्रकृति इस तरह झूम उठती है मानो पृथ्वी अपनी हरी-भरी बाहें फैलाकर सबका अभिनंदन कर रही हो। श्रावण के महीने को हिंदू धर्मावलंबी भगवान शिव का महीना मान मानकर भगवान शिव की पूजा अर्चना करते हैं। कावड़िए देशभर में विभिन्न नदी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तालाबों से जल लाकर भगवान शिव का अभिषेक करते हैं। गणगौर के बाद त्योहारों का सिलसिला रुक जाता है वह एक बार फिर श्रावण मास की तीज से प्रारंभ हो जाता है। श्रावण का महीना महिलाओं के लिए विशेष उल्लास का महीना होता है। इस महीने में आने वाले अधिकांश लोक पर्व  महिलाओं द्वारा ही मनाए जाते हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रावण मास का आगमन ही इस त्यौहार के आने की आहट सुनाने लगता है। समस्त सृष्टि सावन के अदभूत सौंदर्य में भिगी हुई सी नजर आती है। यह पर्व भारतीय जनमानस के अटूट विश्वास को और अधिक प्रगाढ़ता प्रदान करने का पर्व है। इस पर्व में हरियाली शब्द से ही साफ है कि इसका ताल्लुक पेड़-पौधों और पर्यावरण से है। यह त्योहार जीवन में जश्न का प्रतीक है और हरियाली तीज का पर्व प्रकृति का त्योहार हैं। इस मौके पर महिलाएं अच्छी फसल के लिए भी प्रार्थना करती हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">सावन के महीने में सिंजारा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">तीज</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">नागपंचमी एवं सावन के सोमवार जैसे लोकपर्व उत्साह पूर्वक मनाए जाते हैं। श्रावण के महीने में मनायी जानेवाली हरियाली तीज आस्था</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">प्रेम</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">सौंदर्य व उमंग का त्यौहार है। तीज को मुख्यतः महिलाओं का त्यौहार माना जाता है। यह पर्व महिलाओं की सांस्कृतिक मान्यताओं का प्रतीक है। सावन माह में मनाया जाने वाला हरियाली पर्व दंपतियों के वैवाहिक जीवन में समृद्धि</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">खुशी और तरक्की का प्रतीक है। तीज का त्यौहार भारत के कोने-कोने में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण त्यौहार है। यह त्यौहार भारत के  उत्तरी क्षेत्र में हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">श्रावण में में चारों ओर हरियाली की चादर सी बिखर जाती है। जिसे देख कर सबका मन झूम उठता है। सावन का महिना एक अलग ही मस्ती और उमंग लेकर आता है। श्रावण के सुहावने मौसम के मध्य में आता है तीज का त्यौहार। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को श्रावणी तीज कहते हैं। उत्तर भारत में यह हरियाली तीज के नाम से भी जानी जाती है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">धार्मिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए इस व्रत का पालन किया था। परिणामस्वरूप भगवान शिव ने उनके तप से प्रसन्न होकर उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया था। माना जाता है कि श्रावण शुक्ल तृतीया के दिन माता पार्वती ने सौ वर्षों के तप उपरान्त भगवान शिव को पति रूप में पाया था। इसी मान्यता के अनुसार स्त्रियां माता पार्वती का पूजन करती हैं। हाथों में रची मेंहंदी की तरह ही प्रकृति पर भी हरियाली की चादर सी बिछ जाती है। इस नयनाभिराम सौंदर्य को देखकर मन में स्वतः ही मधुर झनकार सी बजने लगती है और हृदय पुलकित होकर नाच उठता है। इस समय वर्षा ऋतु की बौछारें प्रकृति को पूर्ण रूप से भिगो देती हैं। सावन की तीज में महिलाएं व्रत रखती हैं। इस व्रत को अविवाहित कन्याएं योग्य वर को पाने के लिए करती हैं तथा विवाहित महिलाएं अपने सुखी दांपत्य की चाहत के लिए करती हैं।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">तीज पर मेहंदी लगाने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">चूडियां पहनने</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">झूला झूलने तथा लोक गीतों को गाने का विशेष महत्व है। तीज के त्यौहार वाले दिन खुले स्थानों पर बड़े-बड़े वृक्षों की शाखाओं पर</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घर की छत पर या बरामदे में झूले लगाए जाते हैं जिन पर स्त्रियां झूला झूलती हैं। हरियाली तीज के दिन अनेक स्थानों पर मेलों का भी आयोजन होता है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">राजस्थान में जिन कन्याओं की सगाई हो गई होती है। उन्हें अपने होने वाले सास  ससुर से एक दिन पहले ही भेंट मिलती है। इस भेंट को स्थानीय भाषा में सिंझारा कहते हैं। सिंझारा में मेंहदी</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लाख की चूडियां</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">लहरिया नामक विशेष वेश-भूषा</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">घेवर नामक मिठाई जैसी कई वस्तुएं होती हैं। पीहर पक्ष द्धारा अपनी विवाहित पुत्री को भी सिंजारा भेजा जाता है। जिसे पूजा के बाद सास को सुपुर्द कर दिया जाता है। राजस्थान में नवविवाहिता युवतियों को सावन में ससुराल से मायके बुलाने की भी परम्परा है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">तीज के अवसर पर नवयुवतियां हाथों में मेंहदी रचाते हुए गीत गाती हैं। समूचा वातावरण शृंगार से अभिभूत हो उठता है। इस त्योहार की सबसे बड़ी विशेषता है कि महिलाओं का हाथों पर विभिन्न प्रकार से बेलबूटे बनाकर मेंहदी रचाना। राजस्थान में हाथों व पांवों में भी विवाहिताएं मेंहदी रचाती हैं। जिसे मेंहदी मांडना कहते हैं। इस दिन राजस्थानी बालाएं दूर देश गए अपने पति के तीज पर आने की कामना करती हैं। जो कि उनके लोकगीतों में भी मुखरित होता है। राजस्थान के गांवों में पहले लड़किया गुड्डे-गुड्डी का खेल खेलती थी। तीज के दिन से गुड्डे-गुड्डी का खेल खेलना बन्द कर देती थी। इसलिये गांव की लड़किया एक साथ एकत्रित होकर अपनी पुरानी गुड्डे-गुड्डी को गांव के पास के नदी</span>,<span lang="hi" xml:lang="hi">तालाब</span>, <span lang="hi" xml:lang="hi">जोहड़ में बहा देती थी। जिसे गुड्डी बहावना कहा जाता था।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">अपने सुखी दांपत्य जीवन की कामना के लिये स्त्रियां यह व्रत किया करती हैं। इस दिन उपवास कर भगवान शंकर-पार्वती की बालू से मूर्ति बनाकर शोडशोपचार पूजन किया जाता है जो रात्रि भर चलता है। स्त्रियों द्धारा सुंदर वस्त्र धारण किये जाते है तथा घर को सजाया जाता है। इसके बाद मंगल गीतों से रात्रि जागरण किया जाता है। इस व्रत को करने वालि स्त्रियों को पार्वती के समान सुख प्राप्त होता है। तीज का आगमन वर्षा ऋतु के आगमन के साथ ही आरंभ हो जाता है। आसमान काले मेघों से आच्छादित हो जाता है और वर्षा की फोहार पड़ते ही हर वस्तु नवरूप को प्राप्त करती है। ऐसे में भारतीय लोक जीवन में हरियाली तीज या कजली तीज महोत्सव का बहुत गहरा प्रभाव देखा जा सकता है।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">आज के दौर में ये सब बीती बाते बन कर रह गयी है। राजस्थान में मान्यता है कि गणगौर के साथ ही पर्व-त्यौंहार मनाना बन्द हो जाते हैं। वो तीज के दिन से पुनः मनाये जाने लगते हैं। तीज से शुरू होने के बाद त्योंहारों का सिलसिला गणगौर तक चलता है। इसीलिये राजस्थान में एक कहावत प्रचलित है तीज त्योंहारा बावड़ी ले डूबी गणगौर।</span></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi">आलेखः-</span></p>
<p class="MsoNormal"><img src="https://www.gambheersamachar.in/media/c500x800/2026-08/00-00-00-aa-ramesh-1.jpg" alt="00 00 00 AA RAMESH-1" width="146" height="233"></img></p>
<p class="MsoNormal"><span lang="hi" xml:lang="hi"><strong>रमेश सर्राफ झुंझुनू,</strong><strong>राजस्थान 9414255034</strong></span></p>
<p class="MsoNormal"> </p>
<p class="MsoNormal">(<span lang="hi" xml:lang="hi">लेखक राजस्थान सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं।)</span></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 16:26:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Gambheer Samachar ]]></dc:creator>
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                <title>श्रावण में हर सोमवार को शिव भक्त कांवड़ियों  के सिर पर हेलीकॉप्टर से बरसाए जाएंगे फूल </title>
                                    <description><![CDATA[<p><br /><em><strong>निज संवाददाता</strong></em> : श्रावण मास में हर सोमवार को हेलीकॉप्टर से शिव भक्तों के सिर पर फूल बरसाए जाएंगे। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इसकी घोषणा की। उन्होंने यह भी कहा कि शेवड़ाफुली से तारकेश्वर तक हर 5 किमी  पर भक्तों के लिए सर्विस सेंटर बनाए जाएंगे। तारकेश्वर मंदिर के रेनोवेशन और ब्यूटीफिकेशन के लिए 15 करोड़ रुपये की लागत से काम चल रहा है। उन्होंने कहा कि वे कल तारकेश्वर जाएंगे।<br />मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य के दूसरे जिलों में श्रावण मेले के दौरान सरकार मदद देती है। अब तक पश्चिम बंगाल इस मदद से वंचित रहा है। लेकिन अब</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.gambheersamachar.in/religion-culture/every-monday-in-shravan-flowers-will-be-showered-on-the/article-3281"><img src="https://www.gambheersamachar.in/media/400/2026-07/whatsapp-image-2026-07-13-at-4.02.13-pm.jpeg" alt=""></a><br /><p><br /><em><strong>निज संवाददाता</strong></em> : श्रावण मास में हर सोमवार को हेलीकॉप्टर से शिव भक्तों के सिर पर फूल बरसाए जाएंगे। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इसकी घोषणा की। उन्होंने यह भी कहा कि शेवड़ाफुली से तारकेश्वर तक हर 5 किमी  पर भक्तों के लिए सर्विस सेंटर बनाए जाएंगे। तारकेश्वर मंदिर के रेनोवेशन और ब्यूटीफिकेशन के लिए 15 करोड़ रुपये की लागत से काम चल रहा है। उन्होंने कहा कि वे कल तारकेश्वर जाएंगे।<br />मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य के दूसरे जिलों में श्रावण मेले के दौरान सरकार मदद देती है। अब तक पश्चिम बंगाल इस मदद से वंचित रहा है। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। इस साल सरकार ने राज्य के तीन शिव मंदिरों को तीन एरिया के तौर पर चुना है। वे हैं हुगली में तारकेश्वर धाम, जलपाईगुड़ी में जलपेश मंदिर और जयंती एरिया में एक शिव मंदिर। शेवड़ाफुली से तारकेश्वर की दूरी करीब 30  किमी  है। इस रास्ते से लाखों शिव भक्त जल लेकर तारकेश्वर तक पैदल जाते हैं। इसलिए, श्रद्धालुओं की मुश्किल कम करने के लिए रास्ते में हर 5 किलोमीटर पर सर्विस सेंटर बनाए जा रहे हैं। इसके अलावा, श्रावण महीने में श्रद्धालुओं के लिए पुलिस सहायता केंद्र, मेडिकल कैंप, पानी, ओआरएस  और आराम करने की जगहें भी होंगी। श्रद्धालु उन सभी जगहों पर सरकारी मदद ले सकेंगे।<br />मुख्यमंत्री ने कहा कि अगर मौसम अच्छा रहा तो श्रावण महीने के हर सोमवार को हेलीकॉप्टर से श्रद्धालुओं पर फूल बरसाए जाएंगे। सरकार ने यह फैसला लिया है। मुख्यमंत्री श्रावण महीना शुरू होने से पहले कल तारकेश्वर जा रहे हैं। वे 16 जुलाई को कोलकाता में पारंपरिक इस्कॉन रथ यात्रा में मौजूद रहेंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>स्थानीय</category>
                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 14 Jul 2026 16:51:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Gambheer Samachar ]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>रथ यात्रा एक बहुत बड़ा एवं लोकप्रिय हिन्दु त्यौहार....</title>
                                    <description><![CDATA[<p class="dpContent">रथ यात्रा एक बहुत बड़ा एवं लोकप्रिय हिन्दु त्यौहार है। यह उत्सव प्रतिवर्ष भारत के <strong>ओडिशा</strong>  राज्य के <strong>पुरी</strong>  नामक नगर में धूमधाम से मनाया जाता है। रथ यात्रा का उत्सव विश्व प्रसिद्ध <strong>जगन्नाथ मन्दिर</strong>  में आयोजित किया जाता है। रथ यात्रा का दिन हिन्दु चन्द्र कैलेण्डर के आधार पर निर्धारित किया जाता है। हिन्दु चन्द्र कैलेण्डर के अनुसार, यह उत्सव आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पर मनाया जाता है। वर्तमान में यह ग्रेगोरियन कैलेण्डर में जून या जुलाई के माह में आता है।</p>
<p class="dpContent">मुख्य रूप से <strong>भगवान जगन्नाथ</strong>  की पूजा पुरी शहर के प्रसिद्ध जगन्नाथ<em>"जग</em></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.gambheersamachar.in/religion-culture/rath-yatra-is-a-very-big-and-popular-hindu-festival/article-3276"><img src="https://www.gambheersamachar.in/media/400/2026-07/image-(4).png" alt=""></a><br /><p class="dpContent">रथ यात्रा एक बहुत बड़ा एवं लोकप्रिय हिन्दु त्यौहार है। यह उत्सव प्रतिवर्ष भारत के <strong>ओडिशा</strong> राज्य के <strong>पुरी</strong> नामक नगर में धूमधाम से मनाया जाता है। रथ यात्रा का उत्सव विश्व प्रसिद्ध <strong>जगन्नाथ मन्दिर</strong> में आयोजित किया जाता है। रथ यात्रा का दिन हिन्दु चन्द्र कैलेण्डर के आधार पर निर्धारित किया जाता है। हिन्दु चन्द्र कैलेण्डर के अनुसार, यह उत्सव आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पर मनाया जाता है। वर्तमान में यह ग्रेगोरियन कैलेण्डर में जून या जुलाई के माह में आता है।</p>
<p class="dpContent">मुख्य रूप से <strong>भगवान जगन्नाथ</strong> की पूजा पुरी शहर के प्रसिद्ध जगन्नाथ मन्दिर में की जाती है। भगवान जगन्नाथ को भगवान विष्णु का ही एक रूप माना जाता है तथा इन्हें वैष्णव धर्म के अनुयायियों द्वारा भी पूजा जाता है। जगन्नाथ का शाब्दिक अर्थ है <em>"जग के नाथ"</em>, अर्थात ब्रह्माण्ड के स्वामी। जगन्नाथ मन्दिर पवित्र चार धामों में से एक महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थल है। <strong>चार धाम</strong> की यात्रा हिन्दु धर्म में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मानी जाती है, यही कारण है कि, प्रत्येक हिन्दु अपने जीवनकाल में चार धाम की यात्रा करना चाहता है। भगवान जगन्नाथ की पूजा उनके भाई <strong>बलभद्र</strong> तथा उनकी बहन देवी <strong>सुभद्रा</strong> के साथ की जाती है।</p>
<p class="dpContent">यह रथ यात्रा भगवान जगन्नाथ के वार्षिक <strong>गुंडिचा माता मन्दिर</strong> के भ्रमण का प्रतीक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, पुरी जगन्नाथ मन्दिर का निर्माण <strong>राजा इन्द्रद्युम्न</strong> ने किया था तथा राजा इन्द्रद्युम्न की धर्मपत्नी ने भगवान जगन्नाथ के लिये गुंडिचा माता मन्दिर का निर्माण किया था। इसीलिये राजा इन्द्रद्युम्न की पत्नी <strong>रानी गुंडिचा</strong> की भक्ति का सम्मान करने के लिये भगवान जगन्नाथ, बलभद्र एवं देवी सुभद्रा अपना मुख्य मन्दिर छोड़कर कुछ दिनों तक रानी गुंडिचा द्वारा निर्मित गुंडिचा माता मन्दिर में निवास करते हैं।</p>
<p class="dpContent">रथ यात्रा से एक दिवस पूर्व, गुंडिचा मन्दिर को भगवान जगन्नाथ के भक्तों द्वारा स्वच्छ एवं सुसज्जित किया जाता है। गुंडिचा मन्दिर को स्वच्छ एवं सुसज्जित करने की इस प्रथा को <strong>गुंडिचा मार्जन</strong> के रूप में जाना जाता है तथा इसका आयोजन सदैव रथ यात्रा से एक दिवस पूर्व ही किया जाता है।</p>
<p class="dpContent">रथयात्रा के चतुर्थ दिवस को <strong>हेरा पञ्चमी</strong> के रूप में मनाया जाता है। हेरा पञ्चमी पर भगवान जगन्नाथ की पत्नी <strong>देवी लक्ष्मी</strong>, भगवान जगन्नाथ की खोज में गुंडिचा मन्दिर जाती हैं। हेरा पञ्चमी को पञ्चमी तिथि के समान नहीं समझा जाना चाहिये, क्योंकि रथयात्रा के पश्चात चौथे दिन हेरा पञ्चमी मनायी जाती है तथा साधारणतः इस दिन षष्ठी तिथि होती है।</p>
<p class="dpContent">गुंडिचा मन्दिर में आठ दिवस विश्राम करने के पश्चात भगवान जगन्नाथ पुनः अपने मुख्य निवास पर लौट आते हैं। इस दिवस को <strong>बहुदा यात्रा</strong> अथवा <strong>वापसी यात्रा</strong> के रूप में जाना जाता है। बहुदा यात्रा, रथ यात्रा के आठ दिवस पश्चात दशमी तिथि पर आयोजित की जाती है। हालाँकि, रथ यात्रा से लेकर गुंडिचा मन्दिर में ठहरने की समयावधि के मध्य यदि कोई तिथि घटती-बढ़ती है, तो बहुदा यात्रा दशमी तिथि पर न होकर किसी अन्य तिथि पर हो सकती है। बहुदा यात्रा के समय एक छोटा पड़ाव आता है, जहाँ भगवान जगन्नाथ कुछ समय के लिये रुकते हैं। इस स्थान को <strong>मौसी माँ मन्दिर</strong> के रूप में जाना जाता है, जो कि, <strong>देवी अर्धाशिनी</strong> को समर्पित एक दिव्य स्थल है।</p>
<p class="dpContent">यह स्मरण रहे कि, भगवान जगन्नाथ <a class="dpContentLink" href="https://www.drikpanchang.com/ekadashis/devshayani/devshayani-ekadashi-date-time.html?year=2026">देवशयनी एकादशी</a> से पूर्व ही अपने मुख्य निवास में लौट आते हैं, क्योंकि भगवान जगन्नाथ चार माह के लिये निद्रा में लीन रहते हैं। इस चार माह की समयावधि को चातुर्मास के रूप में जाना जाता है। विदेशी पर्यटकों के मध्य रथ यात्रा को <strong>पुरी कार महोत्सव</strong> के रूप में भी जाना जाता है।</p>
<p class="dpContent">यह स्मरण रहे कि रथ यात्रा के अनुष्ठान रथ यात्रा दिवस से बहुत पहले ही आरम्भ हो जाते हैं। रथयात्रा से लगभग 18 दिवस पूर्व भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र तथा बहन देवी सुभद्रा को पवित्र स्नान कराया जाता है, जो कि <strong>स्नान यात्रा</strong> के नाम से प्रसिद्ध है। स्नान यात्रा दिवस ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा तिथि पर मनाया जाता है। यह तिथि मुख्य रूप से <strong>ज्येष्ठ पूर्णिमा</strong> के रूप में लोकप्रिय है।</p>
<p class="dpContent"> वर्ष 2026 में यह पवित्र रथ यात्रा 16 जुलाई, गुरुवार से प्रारंभ होकर 24 जुलाई को बहुदा यात्रा के साथ संपन्न होगी। यह आयोजन हर साल लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है, जो इसे अत्यंत पुण्यदायी और आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण मानते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 Jul 2026 17:38:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Gambheer Samachar ]]></dc:creator>
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                <title>दिल्ली से कालीघाट तक आस्था और संकल्प की पदयात्रा</title>
                                    <description><![CDATA[<p><br /><br /><em><strong>दिल्ली</strong></em> : दिल्ली के एक युवक ने पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने की कामना और अपने संकल्प को व्यक्त करने के लिए दिल्ली से कोलकाता स्थित कालीघाट काली मंदिर तक पैदल यात्रा पूरी की। यात्रा का समापन उन्होंने माँ काली के दर्शन और पूजा-अर्चना के साथ किया।<br /><br />कई दिनों तक चली इस कठिन यात्रा में उन्होंने अनेक राज्यों और शहरों से होकर सफर तय किया। रास्ते में लोगों ने उनका स्वागत किया और उनके संकल्प के बारे में जानने की उत्सुकता दिखाई। कोलकाता पहुँचकर उन्होंने माँ काली के चरणों में मत्था टेका और राज्य में सुख,</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.gambheersamachar.in/religion-culture/march-of-faith-and-determination-from-delhi-to-kalighat/article-3187"><img src="https://www.gambheersamachar.in/media/400/2026-06/img_20260626_164109.png" alt=""></a><br /><p><br /><br /><em><strong>दिल्ली</strong></em> : दिल्ली के एक युवक ने पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने की कामना और अपने संकल्प को व्यक्त करने के लिए दिल्ली से कोलकाता स्थित कालीघाट काली मंदिर तक पैदल यात्रा पूरी की। यात्रा का समापन उन्होंने माँ काली के दर्शन और पूजा-अर्चना के साथ किया।<br /><br />कई दिनों तक चली इस कठिन यात्रा में उन्होंने अनेक राज्यों और शहरों से होकर सफर तय किया। रास्ते में लोगों ने उनका स्वागत किया और उनके संकल्प के बारे में जानने की उत्सुकता दिखाई। कोलकाता पहुँचकर उन्होंने माँ काली के चरणों में मत्था टेका और राज्य में सुख, शांति, समृद्धि तथा लोकतांत्रिक मूल्यों की मजबूती की प्रार्थना की।<br /><br />यह पदयात्रा राजनीतिक समर्थन के साथ-साथ दृढ़ इच्छाशक्ति, अनुशासन और आस्था का भी उदाहरण है। चाहे किसी भी राजनीतिक विचारधारा से जुड़ाव हो, लोकतंत्र में शांतिपूर्ण और अहिंसक तरीके से अपनी बात रखना भारतीय लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण विशेषता है।<br /><br /><br /></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राष्ट्रीय</category>
                                            <category>स्थानीय</category>
                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 26 Jun 2026 16:46:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Gambheer Samachar ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बांग्लादेश के प्रमुख हिंदू धार्मिक परिसर को लेकर विवाद</title>
                                    <description><![CDATA[<p>बांग्लादेश के रंगपुर डिवीजन के गाइबांधा जिले में स्थित एक प्रमुख हिंदू धार्मिक परिसर को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। मीडिया रिपोर्टों और स्थानीय सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि कुछ कट्टरपंथी समूह परिसर में स्थापित राम, कृष्ण और शिव की प्रतिमाओं को नुकसान पहुंचाने तथा परिसर के विस्तार का विरोध कर रहे हैं। इन दावों के बाद क्षेत्र के हिंदू समुदाय और श्रद्धालुओं के बीच चिंता का माहौल है। होसैनपुर यूनियन के रामचंद्रपुर गांव में स्थित यह धार्मिक परिसर पिछले कुछ वर्षों में एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में उभरा है।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.gambheersamachar.in/international/controversy-over-major-hindu-religious-complex-of-bangladesh/article-3122"><img src="https://www.gambheersamachar.in/media/400/2026-06/1-a-16.jpg" alt=""></a><br /><p>बांग्लादेश के रंगपुर डिवीजन के गाइबांधा जिले में स्थित एक प्रमुख हिंदू धार्मिक परिसर को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। मीडिया रिपोर्टों और स्थानीय सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि कुछ कट्टरपंथी समूह परिसर में स्थापित राम, कृष्ण और शिव की प्रतिमाओं को नुकसान पहुंचाने तथा परिसर के विस्तार का विरोध कर रहे हैं। इन दावों के बाद क्षेत्र के हिंदू समुदाय और श्रद्धालुओं के बीच चिंता का माहौल है। होसैनपुर यूनियन के रामचंद्रपुर गांव में स्थित यह धार्मिक परिसर पिछले कुछ वर्षों में एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में उभरा है। स्थानीय समाजसेवी हरिदास बाबू की पहल से शुरू हुई यह परियोजना अब एक विशाल धार्मिक परिसर का रूप ले चुकी है, जहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इस परिसर की प्रमुख पहचान लगभग 50 फीट ऊंची भगवान कृष्ण की प्रतिमा है, जिसे बांग्लादेश की सबसे ऊंची कृष्ण प्रतिमा बताया जाता है। इसका उद्घाटन नवंबर 2025 में भारत के सहायक उच्चायुक्त मनोज कुमार द्वारा किया गया था। इसके बाद से यह स्थल धार्मिक पर्यटन का प्रमुख केंद्र बन गया है। मंदिर समिति की दीर्घकालिक योजना के तहत परिसर में भगवान राम, भगवान शिव सहित विभिन्न देवी-देवताओं की कुल 144 प्रतिमाएं स्थापित करने और अन्य धार्मिक संरचनाओं के निर्माण का लक्ष्य रखा गया है। परियोजना के समर्थकों का कहना है कि यह बांग्लादेश की सांस्कृतिक विविधता और धार्मिक सह-अस्तित्व का प्रतीक है। विवाद के बीच सरकार की ओर से अब तक कोई विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इसी कारण राजनीतिक और सामाजिक हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि प्रशासन इस मामले में क्या कदम उठाएगा और धार्मिक स्थलों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्या कार्रवाई की जाएगी। विशेषज्ञों का कहना है कि मामला केवल एक धार्मिक परिसर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह धार्मिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से भी जुड़ा हुआ है। बांग्लादेश का संविधान सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। ऐसे में किसी भी धार्मिक स्थल या प्रतीक के खिलाफ हिंसा या तोड़फोड़ की धमकियां प्रशासन के लिए गंभीर चुनौती मानी जा रही हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>अंतर्राष्ट्रीय</category>
                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                    

                <link>https://www.gambheersamachar.in/international/controversy-over-major-hindu-religious-complex-of-bangladesh/article-3122</link>
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                <pubDate>Sat, 13 Jun 2026 15:20:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Gambheer Samachar ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अमरनाथ यात्रा 2026 को लेकर जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा के सख्त इंतजाम</title>
                                    <description><![CDATA[<p>  <em><strong>श्रीनगर</strong></em> : अमरनाथ यात्रा 2026 को लेकर जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा के सख्त इंतजाम किए जा रहे हैं। 3 जुलाई से शुरू होकर 28 अगस्त तक चलने वाली इस वर्ष की यात्रा के लिए 80 हजार से अधिक सुरक्षा कर्मियों की तैनाती की जाएगी। अधिकारियों के अनुसार यह अमरनाथ यात्रा के इतिहास की सबसे बड़ी सुरक्षा व्यवस्था मानी जा रही है। सुरक्षा योजना के तहत लगभग 60 हजार अर्धसैनिक बलों के जवानों को जम्मू-कश्मीर में तैनात किया जाएगा। इसके लिए केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) की करीब 700 कंपनियां विभिन्न संवेदनशील क्षेत्रों में लगाई जाएंगी। इनके अलावा पहले से तैनात जम्मू-कश्मीर</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.gambheersamachar.in/religion-culture/strict-security-arrangements-in-jammu-and-kashmir-regarding-amarnath-yatra/article-3036"><img src="https://www.gambheersamachar.in/media/400/2026-05/image-(2).png" alt=""></a><br /><p> <em><strong>श्रीनगर</strong></em> : अमरनाथ यात्रा 2026 को लेकर जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा के सख्त इंतजाम किए जा रहे हैं। 3 जुलाई से शुरू होकर 28 अगस्त तक चलने वाली इस वर्ष की यात्रा के लिए 80 हजार से अधिक सुरक्षा कर्मियों की तैनाती की जाएगी। अधिकारियों के अनुसार यह अमरनाथ यात्रा के इतिहास की सबसे बड़ी सुरक्षा व्यवस्था मानी जा रही है। सुरक्षा योजना के तहत लगभग 60 हजार अर्धसैनिक बलों के जवानों को जम्मू-कश्मीर में तैनात किया जाएगा। इसके लिए केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) की करीब 700 कंपनियां विभिन्न संवेदनशील क्षेत्रों में लगाई जाएंगी। इनके अलावा पहले से तैनात जम्मू-कश्मीर पुलिस और भारतीय सेना के करीब 20 हजार जवान भी यात्रा सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। यात्रा मार्गों, आधार शिविरों, संवेदनशील स्थानों और श्रद्धालुओं के ठहराव केंद्रों पर विशेष निगरानी रखी जाएगी। सुरक्षा एजेंसियां आधुनिक तकनीक, निगरानी उपकरणों और बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था के जरिए यात्रा को सुरक्षित और सुचारु बनाने की तैयारी में जुटी हैं। इस वर्ष सुरक्षा बढ़ाने का एक प्रमुख कारण यात्रा की अवधि में वृद्धि भी है। पिछले वर्ष यात्रा 38 दिनों तक चली थी, जबकि इस बार इसकी अवधि लगभग दो महीने निर्धारित की गई है। लंबी अवधि के कारण अधिक संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना जताई जा रही है। प्रशासन को उम्मीद है कि इस बार देशभर से 5 लाख से अधिक श्रद्धालु बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए पहुंचेंगे। इसे देखते हुए सुरक्षा के साथ-साथ यातायात, स्वास्थ्य सेवाओं, आवास और आपदा प्रबंधन की व्यवस्थाओं को भी मजबूत किया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि श्रद्धालुओं की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और यात्रा के दौरान किसी भी चुनौती से निपटने के लिए सुरक्षा बलों तथा प्रशासन के बीच समन्वित व्यवस्था बनाई गई है। इससे श्रद्धालुओं को सुरक्षित एवं सुविधाजनक यात्रा सुनिश्चित की जा सकेगी |</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राष्ट्रीय</category>
                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                    

                <link>https://www.gambheersamachar.in/religion-culture/strict-security-arrangements-in-jammu-and-kashmir-regarding-amarnath-yatra/article-3036</link>
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                <pubDate>Sat, 30 May 2026 13:36:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Gambheer Samachar ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव ने गंगा दशहरा पर देवी सागर तालाब के गहरीकरण कार्य का शुभारंभ किया,</title>
                                    <description><![CDATA[<div class="post_date">
<h6><em><strong>भोपाल</strong></em> : <span style="font-size:medium;">मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सोमवार को धार जिले के धार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्व के देवी सागर तालाब के गहरीकरण कार्य का शुभारंभ कर स्वयं श्रमदान भी किया। जल संरक्षण और जल स्रोतों के संवर्धन को लेकर राज्य सरकार द्वारा चलाए जा रहे “जल गंगा संवर्धन अभियान” के तहत गंगा दशहरा के अवसर पर हुए इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने देवी तालाब में विधि-विधान से पूजन-अर्चन किया तथा श्रमदान कर जल बचाने में जन-सहभागिता का संदेश भी दिया।</span></h6>
</div>
<p align="justify"><span style="font-size:medium;">मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि जल संरक्षण केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि जनभागीदारी से जुड़ा एक सामाजिक</span></p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.gambheersamachar.in/mp/chief-minister-dr-yadav-donated-labor-in-devi-sagar-pond/article-3027"><img src="https://www.gambheersamachar.in/media/400/2026-05/inner-bhopal250526061357.jpg" alt=""></a><br /><div class="post_date">
<h6><em><strong>भोपाल</strong></em> : <span style="font-size:medium;">मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सोमवार को धार जिले के धार्मिक एवं ऐतिहासिक महत्व के देवी सागर तालाब के गहरीकरण कार्य का शुभारंभ कर स्वयं श्रमदान भी किया। जल संरक्षण और जल स्रोतों के संवर्धन को लेकर राज्य सरकार द्वारा चलाए जा रहे “जल गंगा संवर्धन अभियान” के तहत गंगा दशहरा के अवसर पर हुए इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने देवी तालाब में विधि-विधान से पूजन-अर्चन किया तथा श्रमदान कर जल बचाने में जन-सहभागिता का संदेश भी दिया।</span></h6>
</div>
<p align="justify"><span style="font-size:medium;">मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि जल संरक्षण केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं, बल्कि जनभागीदारी से जुड़ा एक सामाजिक अभियान है। प्रदेशभर में जल स्रोतों के संरक्षण और संवर्धन के लिए व्यापक स्तर पर कार्य किए जा रहे हैं। उन्होंने नागरिकों से जल बचाने और पारंपरिक जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने में सहभागिता निभाने का आह्वान किया।</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:medium;">इस अवसर पर केंद्रीय महिला एवं बाल विकास राज्यमंत्री श्रीमती सावित्री ठाकुर, नगरीय विकास एवं आवास तथा धार जिले के प्रभारी मंत्री श्री कैलाश विजयवर्गीय, पूर्व मंत्री श्री राज्यवर्धन सिंह दत्तीगांव, विधायिका श्रीमती नीना विक्रम वर्मा, विधायक श्री कालू सिंह ठाकुर सहित अन्य स्थानीय जनप्रतिनिधि एवं वरिष्ठ अधिकारी भी उपस्थित थे।</span></p>
<p align="justify"><span style="font-size:medium;">उल्लेखनीय है कि गंगा दशहरा उत्सव प्रदेशभर में एक साथ मनाया गया। इसके अंतर्गत प्रदेश के सभी जिलों में जल स्रोतों का पूजन किया गया तथा गंगा कलश यात्राएं भी निकाली गईं। कार्यक्रमों के माध्यम से जल संरक्षण के प्रति जनजागरूकता का संदेश दिया गया।</span></p>
<p align="center"><img src="https://www.gambheersamachar.in/media/2026-05/tn5-bhopal250526061040.jpg" alt="TN5-Bhopal250526061040" width="600" height="400"></img></p>
<p align="justify"><span style="font-size:medium;">देवी सागर तालाब धार के ऐतिहासिक साढ़े बारह तालाबों में से एक प्रमुख जल संरचना है। ऐतिहासिक जल प्रबंधन धार के परमार राजाओं और बाद में पवार शासकों ने जल संरक्षण की अद्भूत तकनीकों का विकास किया था। यह बरसों से धार नगर को जलापूर्ति की महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। धार नगर के साढ़े बारह तालाब कुशल इंजीनियरिंग का उत्कृष्ट उदाहरण है। देवी सागर तालाब के संरक्षण के लिए नगरीय निकाय द्वारा प्रतिवर्ष जन जागृति अभियान चलाकर सामाजिक संगठनों के सहयोग से तालाब की निरंतर सफाई कराई जाती है। इस तालाब की निर्माण योजना ऐसी थी कि अन्य ऊपरी तालाबों का अतिरिक्त पानी बहकर इस झील में आता था, जो शहर की जलापूर्ति हमेशा बनाए रखने में सहायक है। इस तालाब के किनारे ऊँची पहाड़ी पर स्थित गढ़ कालिका माता मंदिर देश भर के श्रद्धालुओं के लिए एक महत्वपूर्ण आस्था का केंद्र है। शांत और सुरम्य वातावरण के कारण यह स्थान स्थानीय निवासियों और पर्यटकों के लिए एक प्रमुख आकर्षण स्थल है।</span></p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                            <category>MP</category>
                                    

                <link>https://www.gambheersamachar.in/mp/chief-minister-dr-yadav-donated-labor-in-devi-sagar-pond/article-3027</link>
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                <pubDate>Tue, 26 May 2026 14:13:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Gambheer Samachar ]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title> 01 मई को बुद्ध पूर्णिमा </title>
                                    <description><![CDATA[<p class="dpContent">01 मई को बुद्ध पूर्णिमा है। हिंदू धर्म में पूर्णिमा तिथि का विशेष महत्व होता है। वैशाख माह में पड़ने वाली पूर्णिमा को वैशाख पूर्णिमा, पीपल पूर्णिमा और बुद्ध पूर्णिमा भी कहते हैं। वैशाख पूर्णिमा पर गंगा स्नान, दान, पूजा और जप करने का विशेष महत्व होता है। इस दिन भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी, चंद्रदेव और भगवान बुद्ध की पूजा करने का विधान होता है। वैशाख पूर्णिमा के दिन बुद्ध पूर्णिमा भी मनाई जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान बुद्ध का जन्म, ज्ञान की प्राप्ति और महापरिनिर्वाण हुआ था। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस तिथि पर भगवान</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.gambheersamachar.in/religion-culture/buddha-purnima-on-01-may/article-2916"><img src="https://www.gambheersamachar.in/media/400/2026-04/image-(7)2.png" alt=""></a><br /><p class="dpContent">01 मई को बुद्ध पूर्णिमा है। हिंदू धर्म में पूर्णिमा तिथि का विशेष महत्व होता है। वैशाख माह में पड़ने वाली पूर्णिमा को वैशाख पूर्णिमा, पीपल पूर्णिमा और बुद्ध पूर्णिमा भी कहते हैं। वैशाख पूर्णिमा पर गंगा स्नान, दान, पूजा और जप करने का विशेष महत्व होता है। इस दिन भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी, चंद्रदेव और भगवान बुद्ध की पूजा करने का विधान होता है। वैशाख पूर्णिमा के दिन बुद्ध पूर्णिमा भी मनाई जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान बुद्ध का जन्म, ज्ञान की प्राप्ति और महापरिनिर्वाण हुआ था। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस तिथि पर भगवान विष्णु ने नौवां अवतार भगवान बुद्ध के रूप में लिया था। इस वर्ष बुद्ध पूर्णिमा 01 मई को है। ऐसे में आइए जानते हैं वैखाख पूर्णिमा की तिथि और महत्व के बारे में।</p>
<p class="dpContent">वैशाख माह की बुद्ध पूर्णिमा को <strong>गौतम बुद्ध</strong> के जन्मदिवस के रूप में मनाया जाता है। गौतम बुद्ध का जन्म का नाम <strong>सिद्धार्थ गौतम</strong> था। गौतम बुद्ध एक आध्यात्मिक गुरु थे, जिनकी शिक्षाओं से बौद्ध धर्म की स्थापना हुई थी।</p>
<p class="dpContent">गौतम बुद्ध के जन्म तथा मृत्यु के समय के विषय में अनेक मतभेद हैं, अतः उनकी जन्मतिथि अनिश्चित है। हालाँकि, अधिकांश इतिहासकारों ने बुद्ध के जीवनकाल को 563-483 ई.पू. के मध्य माना है। अधिकांश लोग नेपाल के लुम्बिनी नामक स्थान को बुद्ध का जन्म स्थान मानते हैं। बुद्ध की मृत्यु, उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में 80 वर्ष की आयु में हुई थी।</p>
<p class="dpContent">बौद्धों के लिये, <strong>बोध गया</strong> नामक स्थान गौतम बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थल है। बोधगया के अतिरिक्त, <strong>कुशीनगर</strong>, <strong>लुम्बिनी</strong> तथा <strong>सारनाथ</strong> भी अन्य तीन महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थल हैं। यह माना जाता है कि गौतम बुद्ध ने बोधगया में ज्ञान प्राप्त किया तथा उन्होंने पहली बार सारनाथ में धर्म की शिक्षा दी।</p>
<p class="dpContent">यह माना जाता है कि, गौतम बुद्ध को इसी दिन आत्मज्ञान प्राप्त हुआ था। बुद्ध पूर्णिमा को <strong>बुद्ध जयन्ती</strong> तथा <strong>वैसाक</strong> के नाम से भी जाना जाता है।</p>
<p class="dpContent"> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 14:41:10 +0530</pubDate>
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                <title>हिंदू धर्म में पावन पर्व माना जाता है अक्षय तृतीया</title>
                                    <description><![CDATA[<p><br />पचांग के अनुसार, अक्षय तृतीया का पावन पर्व इस साल 19 अप्रैल 2026, रविवार को पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को आने वाला यह दिन हिंदू धर्म में बहुत पवित्र माना जाता है। ‘अक्षय’ शब्द का अर्थ ही है जिसका कभी विनाश न हो, अर्थात इस दिन किए गए दान और पुण्य का फल कभी समाप्त नहीं होता। आध्यात्मिक दृष्टि से यह समय स्वयं को ईश्वर से जोड़ने और अपनी पुरानी गलतियों को सुधारने का एक सुंदर अवसर प्रदान करता है। इस दिन सूर्य और चंद्रमा दोनों ही अपनी उच्च स्थिति</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.gambheersamachar.in/religion-culture/akshaya-tritiya-is-considered-a-sacred-festival-in-hindu-religion/article-2880"><img src="https://www.gambheersamachar.in/media/400/2026-04/whatsapp-image-2026-04-15-at-2.10.03-pm.jpeg" alt=""></a><br /><p><br />पचांग के अनुसार, अक्षय तृतीया का पावन पर्व इस साल 19 अप्रैल 2026, रविवार को पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को आने वाला यह दिन हिंदू धर्म में बहुत पवित्र माना जाता है। ‘अक्षय’ शब्द का अर्थ ही है जिसका कभी विनाश न हो, अर्थात इस दिन किए गए दान और पुण्य का फल कभी समाप्त नहीं होता। आध्यात्मिक दृष्टि से यह समय स्वयं को ईश्वर से जोड़ने और अपनी पुरानी गलतियों को सुधारने का एक सुंदर अवसर प्रदान करता है। इस दिन सूर्य और चंद्रमा दोनों ही अपनी उच्च स्थिति में होते हैं, जिससे वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह पावन तिथि हमें सिखाती है कि निस्वार्थ भाव से किया गया हर कार्य हमारे भविष्य को उज्जवल बनाता है।<br />अक्षय तृतीया  पर दान करने का बहुत बड़ा महत्व है क्योंकि ऐसा माना जाता है कि इस दिन दी गई वस्तुएं कई गुना होकर वापस मिलती हैं। इस तिथि पर जल से भरे मिट्टी के पात्र, नए वस्त्र और अनाज का दान करना बहुत फलदायी होता है। दूसरों की सहायता करना और जरूरतमंदों के चेहरे पर मुस्कान लाना ही सच्ची पूजा है। जब हम पवित्र मन से समाज की भलाई के लिए कदम उठाते हैं, तो हमारे घर में बरकत आती है और बिगड़े काम बनने लगते हैं। इस दिन अपनी मधुर वाणी से सबका सम्मान करें और कड़वी बातों से पूरी तरह दूर रहें। अपनी मेहनत से कमाए धन का एक छोटा हिस्सा शुभ कार्यों में लगाने से मन को अपार शांति और संतोष का अनुभव होता है।<br />इस विशेष दिन का हर क्षण बहुत शुभ होता है, इसलिए इसे आत्म-चिंतन और किसी भी नई शुरुआत के लिए सबसे उत्तम माना जाता है। इस दिन अपनी बुरी आदतों को छोड़ने और अच्छे गुणों को अपनाने का संकल्प लेना चाहिए। भगवान के सामने बैठकर प्रार्थना करने से मन शांत रहता है और जीवन की चुनौतियों से लड़ने की नई शक्ति मिलती है। अपनी परंपराओं का सम्मान करना ही हमें एक सफल इंसान बनाता है। सात्विक भोजन ग्रहण करने और ईश्वर के नाम का जाप करने से मानसिक तनाव कम होता है और जीवन सहज लगने लगता है। जब हम सच्चे और निष्कपट मन से इस पर्व को मनाते हैं, तो हमारे जीवन के सभी दुख दूर होने लगते हैं और घर में सुख का स्थाई वास होता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म संस्कृति</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 16:57:07 +0530</pubDate>
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