एक दलित! 

एक दलित! 


          
 
एक दलित! 
जब पढ़ लिखकर क़ाबिल बना, 
हमारे गाँव ने ख़ुशियाँ मनाईं.
 
एक दलित! 
जब अफ़सर और सिपाही बना, 
पूरे मुहल्ले ने जश्न मनाया.
 
एक दलित! 
जब ज़िला कलेक्टर व मुख्य सचिव बना, 
पूरे इलाक़े में भव्य कार्यक्रम हुआ.
 
एक दलित! 
जब चुनाव में प्रत्याशी बना, 
पूरे दलित समाज ने भीड़ बढ़ायी.
 
एक दलित! 
जब चुनाव जीता, 
दलित युवकों ने जय भीम का नारा लगाया.
 
एक दलित! 
कभी अभिनेता, कभी खिलाड़ी, कभी बिज़नेस मैन, 
कभी साइंटिस्ट, कभी बुद्धिजीवी बना. 
इस ख़ुशी में हमने सोशल मीडिया पर 
स्टेटस लगाया.
 
एक दलित! 
जब ग़रीबी, प्रताड़ना और हिंसक घटना का शिकार बना. 
उसके दुःख को कोई नहीं समझा.
 
वह पढ़ा लिखा दलित, 
सामने नहीं आया.
जिसके लिए ख़ुशियाँ मनाई थीं.
 
उस दलित अफ़सर और सिपाही ने, 
मुँह फेर लिया.
जिसके लिए जश्न मनाया था.
 
वह दलित ज़िला कलेक्टर और मुख्य सचिव ने, 
पहचानने से इंकार कर दिया.
जिसके लिए कार्यक्रम में शरीक हुए थे.
 
उस दलित नेता ने, 
उजड़े घर को बसाने से 
इनकार कर दिया.
जिसके लिए भीड़ बढ़ाई थी 
और जय भीम के नारे लगाए थे.
 
ख़ैर उन अभिनेता, खिलाड़ी, बिज़नेस मैन, 
साइंटिस्ट और बुद्धिजीवियों का क्या? 
वे तो वर्चुअल थे! 
 
असल ज़िन्दगी में उन दलितों ने, 
मुझ जैसे दलितों का सिर्फ़ फ़ायदा लिया.
आवेग में आने के लिए. 
 
अब मैं ना कोई जश्न मनाता हूँ.
ना कोई भीडतंत्र का पात्र बनता हूँ.
और ना ही कोई उनके जलसे-जुलूस में 
शरीक होता हूँ. 
 
बस्स बहुत हो चुका! 
यह सब देखकर। 
अब औरों की तरह, 
चुपचाप आगे बढ़ जाता हूँ .........

 

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