आखिर जनवरी में ही नया साल क्यूं मनाया जाता है
भारत में 268 साल पहले बदली गई थी नए साल की परंपरा, जानिए क्या थी मजबूरी
भारत में 268 साल पहले बदली गई थी नए साल की परंपरा, जानिए क्या थी मजबूरी
दुनियाभर में तमाम तरह के कैलेंडर माने जाते हैं। एक अनुमान के मुताबिक भारत के 36 तरह के प्राचीन कैलेंडर वर्ष माने जाते हैं। हालांकि, इनमें से अधिकांश अब प्रचलन से बाहर हैं। दुनियाभर में कई देशों के जो अपने कैंलेंडर हैं उनमें नए वर्ष की शुरुआत फरवरी से अप्रैल के मध्य होती है। हमारे यहां भी विक्रम संवत, शक संवत, हिजरी सन और सप्तर्षि संवत आदि प्रचलित हैं। इसके अलावा भी कई सारे देशों में अलग-अलग कैलेंडर भी चलन में हैं मगर पूरी दुनिया में नया साल ग्रिगोरियन कैलेंडर के अनुसार ही मनाया जाता है।
भारत ने अंग्रेजी नव वर्ष को क्यों स्वीकारा और क्यों बदला अपनी गौरवशाली परंपरा वाले भारतीय नव वर्ष विक्रमी संवत को, आदि। आइए जानते हैं आखिर क्या है ग्रिगोरियन कैलेंडर, किस देश ने कब माना एक जनवरी को नया साल और क्या थी हमारे देश की मजबूरी...
नया साल बस कुछ घंटे की दूरी पर ही है. इसके बाद 2025 को अलविदा कह कर दुनिया जनवरी, 2026 में प्रवेश कर जाएगी. नए साल पर लोग अपने अपने तरीके से नए साल का जश्न मनाते हैं. पर कभी दिमाग मे ये सवाल कौंधा है कि आखिर जनवरी में ही नया साल क्यूं मनाया जाता है. आइये जानते हैं.
वर्तमान ग्रिगोरियन कैलेंडर की शुरुआत 438 साल पहले 15 अक्तूबर, 1582 को हुई थी। इस कैलेंडर को आखिरी बार पोप ग्रिगरी 13वें ने संशोधित किया था। ग्रिगोरियन कैलेंडर के अनुसार, क्रिसमस हर वर्ष 25 दिसंबर को निश्चित हो गया। जबकि 31 दिसंबर को साल का आखिरी दिन होता है और नया साल एक जनवरी को शुरू होता है। अमेरिका के नेपल्स के फिजीशियन एलॉयसिस लिलिअस ने 15 अक्तूबर, 1582 को ग्रिगोरियन कैलेंडर के तौर पर एक नया कैलेंडर का इस्तेमाल प्रस्तावित किया था।
सूर्य और चंद्रमा की गणना पर आधारित :
कोई भी कैलेंडर सूर्य चक्र या चंद्रमा चक्र की गणना पर आधारित होता है। सूर्य चक्र पर आधारित कैलेंडर में 365 दिन होते हैं। जबकि चंद्रमा चक्र पर आधारित कैलेंडर में 354 दिन होते हैं। ग्रिगोरियन कैलेंडर सूर्य चक्र पर आधारित है।
जूलियन कैलेंडर :
इससे पहले रूस का जूलियन कैलेंडर प्रचलन में था, जिसमें साल में 10 महीने होते थे। इसमें समस्या यह थी कि क्रिसमस साल में एक निश्चित दिन नहीं आता था। जूलियन कैलेंडर को ईसा पूर्व 46 में जूलियस सीजर ने संशोधित किया था। इससे भी पहले तक जो कैलेंडर चलता था, वह रोमन कैलेंडर था। उसमें साल के सिर्फ 304 दिन ही होते थे। महीने 10 ही थे।
भारत में आज से लगभग 273 साल पहले (1752 में) नए साल की परंपरा में एक बड़ा बदलाव आया था। इससे पहले ब्रिटिश भारत में नया साल मार्च से शुरू होता था, जिसे बदलकर 1 जनवरी कर दिया गया।
इस ऐतिहासिक बदलाव के पीछे के मुख्य कारण और "मजबूरी" निम्नलिखित थी:
कैलेंडर में सुधार
ब्रिटेन और उसके उपनिवेशों (भारत सहित) में पहले 'जूलियन कैलेंडर' का पालन होता था, जो सौर वर्ष की तुलना में हर 128 साल में एक दिन पीछे हो जाता था। इस त्रुटि को सुधारने के लिए पोप ग्रेगरी द्वारा शुरू किए गए 'ग्रेगोरियन कैलेंडर' को अपनाया गया।
11 दिनों का अंतर:
1752 तक जूलियन कैलेंडर वास्तविक सौर समय से 11 दिन पीछे हो चुका था। इसे संतुलित करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने एक कड़ा कदम उठाया: 2 सितंबर 1752 के ठीक अगले दिन को 14 सितंबर 1752 घोषित कर दिया गया। यानी इतिहास से वे 11 दिन (3 से 13 सितंबर) हमेशा के लिए गायब हो गए।
यूरोप के साथ तालमेल: उस समय यूरोप के अधिकांश देश पहले ही ग्रेगोरियन कैलेंडर अपना चुके थे। व्यापार और प्रशासनिक कार्यों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एकरूपता लाने के लिए यह बदलाव अनिवार्य हो गया था।
राजस्व की मजबूरी:
इस बदलाव के कारण ब्रिटिश वित्तीय वर्ष की गणना में भी समस्या आई। 11 दिनों के नुकसान की भरपाई के लिए उन्होंने टैक्स वर्ष की समाप्ति तिथि को 25 मार्च से बढ़ाकर 5 अप्रैल (और बाद में 6 अप्रैल) कर दिया, जो परंपरा आज भी कई वित्तीय प्रणालियों में देखी जाती है।
हालाँकि भारत में पारंपरिक रूप से विक्रम संवत और शक संवत जैसे कैलेंडर भी प्रचलित थे, लेकिन आधिकारिक और वैश्विक कामकाज के लिए 1752 में यह बदलाव लागू किया गया था।
