बंगाल एसआईआर में बड़ा मोड़
हटाए गए 91 फीसदी वोटरों के नाम ट्रिब्यूनल ने फिर से किए बहाल
निज संवाददाता : पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों से पहले काफी संख्या में लोगों के नाम काटे गए थे। इसमें काफी नामों को सुनवाई के लिए रखा गया था। स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' (एसआईआर) में करीब 82,782 वोट देने से वंचित किए गया था। कांग्रेस सांसद ईशा खान चौधरी को मिले आरटीआई जवाब से पता चला है कि 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' (एसआईआर) प्रोसेस के तहत आई 82,782 अपीलों में से ट्रिब्यूनल ने 91 फीसदी वोटरों के नाम बहाल कर दिए हैं।
आरटीआई के जवाब में बताया गया है कि सिर्फ 7,339 नाम ही हटाए गए। एसआईआर प्रोसेस में गड़बड़ियों के कारण 27 लाख वोटरों की पहचान की गई थी और जांच के बाद उनके नाम हटा दिए गए थे, जिसके बाद कुल 38.1 लाख अपीलें आईं थीं। जो हटाए गए नामों की संख्या से कहीं ज्यादा थीं। और अब तक इनमें से सिर्फ 2.17 फीसदी मामलों पर ही फैसला हुआ है। कांग्रेस नेता इसे गड़बड़ियों का सबूत बताते हैं, जबकि आलोचकों का कहना है कि ज्यादातर अपीलें नाम शामिल किए जाने को चुनौती देती हैं। बहाली की ज्यादा दर सिर्फ एक छोटे से प्रोसेस किए गए सैंपल पर आधारित है। यह खुलासा ऐसे वक्त पर हुआ है जब सुप्रीम कोर्ट चुनाव की निष्पक्षता पर नजर रखे हुए है।
कांग्रेस ने इस मुद्दे पर बड़ा हमला बोला है। कांग्रेस ने एक्स पर लिखा है कि पश्िमुदम बंगाल में मोदी और ज्ञानेश कुमार ने मिलकर एसआईआर करवाया और चुनाव चोरी किया। अब इसके सबूत सामने आ रहे हैं। खबर है कि एसआईआर के बाद 82,782 अपीलों पर सुनवाई की गई, जिसमें से 91 फीसदी (75,443) नाम फिर से वोटर लिस्ट में जोड़ दिए गए। जी हां, चुनाव से पहले एसआईआर कराकर नाम काटा गया, फिर चुनाव के बाद वोटर लिस्ट में नाम जोड़ दिए गए।
गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के तहत जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए थे और जिन्होंने अपीलीय ट्रिब्यूनल के समक्ष अपील दायर की थी, उनमें से केवल वे ही लोग विधानसभा चुनावों में वोट डाल पाए थे जिनकी अपीलों का निपटारा ट्रिब्यूनल द्वारा मतदान की तारीख (21 या 27 अप्रैल 2026) से पहले कर दिया गया था। बाकी लोग जिनके मामले उस समय तक लंबित थे, वे वोट नहीं दे पाए।
• ऐसे वास्तविक मतदाता जिनके नाम तार्किक विसंगतियों (जैसे नाम की स्पेलिंग में गलती, उम्र का अंतर, या पुरानी वंशावली के दस्तावेज न होने) के कारण काट दिए गए थे, वे अपना नाम वापस जुड़वाने के लिए इन ट्रिब्यूनलों में भेजे गए थे।
• आरटीआई और सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के आंकड़ों के अनुसार, लगभग 7 लाख अपीलें ऐसे वोटरों द्वारा नाम दोबारा शामिल कराने के लिए दर्ज की गई हैं।
• इन ट्रिब्यूनलों में वे मामले भी भेजे गए हैं जिनमें निर्वाचन आयोग या अन्य शिकायतकर्ताओं द्वारा कुछ लोगों के नाम वोटर लिस्ट में जोड़े जाने पर आपत्ति जताई गई है।
• आंकड़ों के मुताबिक ट्रिब्यूनल में भेजी गई कुल अपीलों में से एक बड़ा हिस्सा (लगभग 31 लाख अपीलें) दूसरों के नाम शामिल करने को चुनौती देने से जुड़ा है।
• ट्रिब्यूनल का नेतृत्व : इन 19 ट्रिब्यूनलों का गठन सुप्रीम कोर्ट के आदेश और कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की सिफारिश पर किया गया है। इनकी अध्यक्षता हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीशों (जैसे पूर्व मुख्य न्यायाधीश टी. एस. शिवगणनम, जस्टिस प्रदीप्त राय और जस्टिस तपेन सेन) द्वारा की जा रही है।
• भारत निर्वाचन आयोग द्वारा आरटीआई में दी गई जानकारी के अनुसार, ट्रिब्यूनलों ने अब तक 82,782 अपीलों का निपटारा किया है, जिनमें से 91 फीसदी वोटरों के नाम सफलतापूर्वक वोटर लिस्ट में वापस बहाल कर दिए गए हैं।
