‘ऊंची जातियों की सेवा करें शूद्र’
आईआईटी मंडी में लगे पोस्टर से विवाद
निज संवाददाता : हिमाचल प्रदेश के आईआईटी मंडी में कृष्ण जन्माष्टमी पर आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान हुए विवाद के बाद मामले की जांच शुरू कर दी गई है। कॉलेज प्रशासन ने जांच के लिए एक समिति का गठन किया है। यह समिति पता लगाएगी कि विवादित पोस्टर किसने बनाया और लगाया। इस पोस्टर को लगाने के पीछे का मकसद क्या था और कार्यक्रम के दौरान इसे किस तरह दिखाया गया। जांच रिपोर्ट आने के बाद ही संस्थान आगे की कार्रवाई करेगा।
आईआईटी मंडी ने कैंपस में भगवद गीता पर आधारित एक विवादित पोस्टर की जांच के आदेश दिए हैं। इस विवादित पोस्टर में कहा गया था कि शूद्रों को “ऊंची जातियों की सेवा करनी चाहिए”। संस्थान के निदेशक लक्ष्मीधर बेहरा ने इसे छात्रों द्वारा धर्मग्रंथ की समझ का नतीजा बताया और संस्थान को इसके कंटेंट से अलग रखा।
इस पूरे मामले को लेकर आईआईटी मंडी प्रशासन ने पल्ला झाड़ने की कोशिश की। आईआईटी मंडी प्रशासन का कहना है कि कुछ छात्रों ने भगवद्गीता की अपने तरीके से व्याख्या की है। आईआईटी मंडी प्रशासन समानता, सामाजिक न्याय, वैज्ञानिक सोच और संविधान के मूल्यों को मानता है और उन्हें बनाए रखेगा।
लक्ष्मीधर बेहरा खुद भगवद गीता की शिक्षा और इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस (इस्कान) से लंबे समय से जुड़े रहे हैं। वे आईआईटी मंडी में थ्री-क्रेडिट वाला गीता कोर्स पढ़ाते हैं और प्रस्तावित भक्तिवेदांत यूनिवर्सिटी के संस्थापक भी हैं, और इसे इस्कान की पहल माना जा रहा है।
बेहरा ने कहा-कुछ छात्रों ने गीता की अपनी तरह से व्याख्या की है। मामले की जांच के लिए मैंने एक समिति बनाई है। यह छात्रों का कार्यक्रम था। उन्होंने जोर देकर कहा कि वह और संस्थान किसी तरह के जातिगत भेदभाव के खिलाफ हैं। कल ही आईआईटी मंडी कम्युनिटी को भेजे गए एक ई-मेल में, जिसका शीर्षक “कैंपस में हाल ही में लगाए गए पोस्टर की कड़ी निंदा” था। बेहरा ने कहा कि 4 सितंबर को जन्माष्टमी के दौरान लगाए गए पोस्टर के बारे में जानकर उन्हें गहरा “सदमा” लगा।
उन्होंने जोर दिया कि संस्थान “किसी भी तरह से” इस तरह के पोस्टर का समर्थन नहीं करता है। उन्होंने लिखा-मैंने खुद निजी तौर पर हर मंच पर किसी भी तरह के जातिगत भेदभाव के खिलाफ जंग लड़ी है। मैंने मामले में जांच के लिए एक समिति बनाई है ताकि संस्थान के कैंपस का इस्तेमाल कभी भी सामाजिक सद्भाव के उल्लंघन के लिए न होने पाए। मैं हमारे समुदाय के उन सदस्यों की भावनाओं को पूरी तरह समझता हूं जिन्हें इस घटना से दुख पहुंचा है।
बेहरा ने बताया कि पोस्टर छात्रों के कार्यक्रम के हिस्से के तौर पर तैयार किया गया था। मामले की जांच करने वाली समिति में फैकल्टी सदस्य और अनुसूचित जाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग सहित अलग-अलग सामाजिक वर्गों के प्रतिनिधि शामिल किए गए हैं। यह विवाद “भगवद गीता – द टाइमलेस विजडम” नाम के एक पोस्टर को लेकर शुरू हुआ, जिसे आईआईटी के ऑडिटोरियम के बाहर लगाया गया था। इस पोस्टर में समाज को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्गों में बांटा गया था।
इसमें ब्राह्मणों की भूमिका “ईश्वर का संदेश फैलाना”, क्षत्रियों की भूमिका “समाज और आध्यात्मिकता की रक्षा करना”, वैश्यों की भूमिका “अर्थव्यवस्था चलाना तथा दूसरों की मदद करना” जबकि शूद्रों की भूमिका “उच्च वर्गों की सेवा करना” बताई गई थी।
साथ ही पोस्टर में भगवद गीता का एक श्लोक भी था, जिसमें कहा गया था कि मानव समाज के 4 वर्गों का निर्माण “भौतिक प्रकृति के 3 गुणों और उनसे जुड़े कार्यों” के आधार पर किया गया है।
