'समानता' (दलित कविता)
आनंद दास
समानता
मैं बिस्तर पर लेटे था।
किसी ने यह पूछा दिया-
क्या भाई तुम्हारे यहां
असमानता है क्या?
तड़के ही उत्तर दिया,
नहीं भाई, नहीं तो !
हमारे पास संविधान है।
तो कैसे होंगे असमान?
घोड़ा और घास
साथ-साथ, पास-पास रहता है ,
शिकार तो घास को ही होना पड़ता है।
फ़िर भी दोनों समान है!
दलित भीड़ बढ़ाए
नेता के लिए वोट मांग लाए ,
चुनाव के समय भाई-बंधु-हितैषी बन जाए ।
कहां कोई असमान है?
विधायक, सांसद, नेता, मंत्री बनते ही
फ़िर वापस लौट आते हैं हम अपने पद पर,
गरीब, शोषित, अछूत, भंगी और दलित !
कहीं कुछ असमान दिखा?
समानता !
बनी हुई है,
सदियों से, कई अरसों से,
चुनाव ही तो जीता है,
कोई आसमान का तारा नहीं।
अच्छे से देखें हम अब भी समान हैं!
समानता !
चुनाव के पहले वाली भी वही है
और चुनाव के बाद वाली भी वही है!
देखें ध्यान से, सब कुछ समान है?
समानता !
ग़रीबी की गरीबों से हैं!
मंत्रालय की मंत्रियों से हैं!
चमार की चमारों से हैं!
ब्राह्मण की ब्राह्मणों से हैं!
अब आप ही बताइए
और आप ही तय कीजिए
कहीं असमानता दिखीं ?
पूरे समाज में फैली है
समानता!
समानता !
बस्स समानता!

