गोरखालैंड मुद्दे पर केंद्रीय गृह राज्यमंत्री ने संसद में दिया जवाब
निज संवाददाता : गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (जीटीए) को लेकर लोकसभा में अहम सवाल उठाया गया। सांसद बापी हाल्दार ने पूछा कि क्या गोरखा मुद्दों के स्थायी समाधान के लिए केंद्रीय वार्ताकार की नियुक्ति पश्चिम बंगाल सरकार से बिना सलाह किए की गई है और यह कदम 2011 के समझौते के अनुरूप है या नहीं। इस सवाल के जवाब में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने विस्तार से जानकारी दी। नित्यानंद राय ने बताया कि जुलाई 2011 में भारत सरकार, पश्चिम बंगाल सरकार और गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के बीच त्रिपक्षीय समझौते के बाद जीटीए का गठन किया गया था। लेकिन जुलाई 2017 में जीटीए के सभी निर्वाचित सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया, जिससे वहां प्रतिनिधित्व की कमी हो गई।
मंत्री ने बताया कि इसके बाद गोरखा नेताओं की बातचीत की मांग को देखते हुए गृह मंत्रालय ने 2020, 2021 और 2025 में तीन त्रिपक्षीय बैठकें आयोजित कीं। इनमें से दो बैठकों में पश्चिम बंगाल सरकार शामिल नहीं हुई और एक में उसका प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं था। इसी स्थिति को देखते हुए केंद्र सरकार ने एक वार्ताकार नियुक्त किया है, जो दार्जिलिंग हिल्स, तराई और डुआर्स क्षेत्रों में विभिन्न पक्षों से बातचीत करेगा। इस वार्ताकार की नियुक्ति एक साल के लिए की गई है।
सरकार के अनुसार, वार्ताकार का मुख्य काम गोरखा समुदाय से जुड़े मुद्दों पर सभी पक्षों से बातचीत करना और समाधान का रास्ता सुझाना है। वह दार्जिलिंग हिल्स, तराई और डुआर्स के लोगों और संगठनों से बात करेगा, ताकि समस्याओं को समझा जा सके और एक रोडमैप तैयार किया जा सके। इसके अलावा, गोरखा समुदाय के सामाजिक और आर्थिक विकास, उनकी सांस्कृतिक पहचान और परंपरा को सुरक्षित रखने के लिए भी सुझाव दिए जाएंगे। सरकार का कहना है कि इन सभी प्रयासों का उद्देश्य गोरखा समुदाय की मांगों को संविधान के दायरे में रहकर पूरा करना है। यह कदम गोरखालैंड मुद्दे के शांतिपूर्ण और स्थायी समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।
