‘मेरी पहचान’

आनंद दास

 ‘मेरी पहचान’

‘मेरी पहचान’
                             
वह अंधेरी!
तेज़ तूफ़ानी रात!
रात के बारह बजे थे।
बिजली की गड़गड़ाहट,
हवा की आहट,
सन्नाटे की सजावट में,
'एक बच्चा'
पैदा लेता है!!


संकरी पगडंडी में,
सड़क किनारे,
फर्श पर सटा,
लेटे रहता है-
'वह बच्चा'!


पास से गुज़रते व्यक्ति ने,
बच्चे को पहचान लिया-
वह कौन है?


लगा,
मां की ममता को जानता हो,
पिता के प्यार को जनता हो,
परिवार के आदर को जनता हो।


वह,
संकरी पगडंडी में,
सड़क किनारे,
जन्माने की वजह से,
जाना!


चलते चलते......
अपने मुंह को,
गंदा करते हुए,
ऐंठन भरी आवाज़ में
कह दिया -
साले होंगे वही,
चुहड़ा चमार!


पूरी दुनिया,
सो रही थी,
खर्राटे भरी आवाज़ से!
उस रात कोई घटना नहीं घटी थी,
'मेरी पहचान'
बताने के अलावा!


कुछ महीने,
बीतने के बाद,
जन्म प्रमाण पत्र ने,
पुष्टि कर दी सरनेम के साथ!


वह जन्म लेने के बाद
वह इंसान नहीं!
वह दलित है!
सिर्फ़ दलित है!!
सिर्फ़ दलित है!!


जन्म लेते वक्त हालातों ने भी
यही बताया.....

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