कभी लता व आशा की आवाज के बिना अधूरी लगती थी बंगाल की दुर्गा पूजा

 कभी लता व आशा की आवाज के बिना अधूरी लगती थी बंगाल की दुर्गा पूजा

निज संवाददाता : एक समय था जब बंगाल की दुर्गा पूजा लाउडस्पीकर पर आशा भोसले और लता मंगेशकर की आवाज़ के बिना अधूरी लगती थी। उनके गाने पूजा रिलीज़ के त्योहारी साउंडस्केप में बुने जाते थे।
 दिवंगत संगीतकार सलिल चौधरी की बेटी अंतरा चौधरी याद करती हैं-अगर आप, 1977 में, पंडाल घूमने जाते, तो एक पंडाल में लताजी का 'अज नोय गुन गुन' बजता, जिसे पिताजी (सलिल चौधरी) ने बनाया था, और दूसरे पंडाल में आशाजी का 'किने दे रेशमी छुरी' बजता था।  उस ज़माने में संगीत की ऐसी दौलत थी। आरडी-आशा एक जोड़ी थे, जैसे सलिल-लता थे।
अंतरा कहती हैं- इसकी प्लानिंग महीनों पहले से शुरू हो जाती थी। म्यूज़िक कंपनियां किसी कंपोज़र (संगीतकार) को किसी खास आर्टिस्ट के साथ काम करने के लिए कहती थीं। मुझे लगता है कि आर.डी. बर्मन को आशाजी के लिए ऐसे ही प्रपोज़ल मिलते थे, जैसे पिताजी को लताजी या हेमंत काकू (हेमंत मुखर्जी) के लिए कंपोज़ करने के लिए कहा जाता था।
इंडस्ट्री के लिए, पूजा एक सही मौसम था। अमल बनर्जी, जिन्होंने 1979 से 2018 तक द ग्रामोफ़ोन कंपनी ऑफ़ इंडिया के साथ काम किया, उस क्रेज़ को याद करते हैं। 72 साल के बनर्जी कहते हैं-हमने अपनी पूजा रिलीज़ के लिरिक्स का कलेक्शन, शरद अर्घ्य निकाला, जिसके लिए डीलर्स ने एडवांस पेमेंट किया। ग्राहक हमारे एस्प्लेनेड की दुकान पर लाइन में लगते थे, और लाइन हिंदुस्तान बिल्डिंग तक जाती थी। डिस्क का पहला लॉट आकाशवाणी भवन और रिटेलर्स को बजाने के लिए जाता था। हमने नए गानों को पब्लिसाइज़ करने के लिए शरद अर्घ्य नाम का एक रेडियो प्रोग्राम भी स्पॉन्सर किया। 
बनर्जी ने भोसले की पहली पूजा रिलीज़ को 1957 में 78आरपीएम डिस्क से जोड़ा, जिसमें सुधीन दासगुप्ता का कंपोज किया हुआ आकाशे आज रोंगर खेल और नाच मयूरी नाच था। इसके बाद 1959 (मन्ना डे के कंपोजर के साथ), 1961 और 1962 (बिनोद चट्टोपाध्याय के साथ), 1963 (नचिकेता घोष) और 1967 (फिर से मन्ना डे) में रिलीज़ हुईं। वे कहते हैं-लेकिन जब उन्होंने आर.डी. बर्मन के साथ टीम बनाई, तभी इस कोलेबोरेशन से कंपनी को फायदा हुआ।
उनकी पहली पूजा रिलीज़, 'जेते दाओ आमे देको ना', 1969 में आई थी। इसके बाद संध्याबेले तुमी अमी (1971), जाबो की जाबो ना (1974), मोयना बोलो तुमी (1976), और 1980 के दशक में और भी रेगुलर तौर पर, अशबो आर एक दिन (1980), माछेर काटा (1982) और किने दे रेशमी चूड़ी (1984) जैसे गाने आए।
बनर्जी कहते हैं-आरडी-आशा की पूजा रिलीज़ 1980 के दशक में हमारी टॉप पसंद बनीं, इसके बाद मन्ना डे की रिलीज़ आई, जिसने सलिल-लता को पीछे छोड़ दिया।
भोसले का आखिरी पूजा गाना हाल ही में 2018 में आया था। यह आशा ऑडियो द्वारा रिलीज़ किया गया एक सिंगल जिसका टाइटल 'पूजॉय आशा' था।

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