केंद्र सरकार ने अनिवार्य ईपीएफओ कवरेज के लिए सैलरी की सीमा 10,000 रुपए तक बढ़ा दिया
प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारियों के लिए अच्छी खबर
निज संवाददाता : प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारियों के लिए अच्छी खबर। नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र सरकार ने अनिवार्य ईपीएफओ कवरेज के लिए सैलरी की सीमा को 10,000 रुपए तक बढ़ा दिया है। पहले, अनिवार्य ईपीएफओ एनरोलमेंट उन कर्मचारियों के लिए था जिनकी बेसिक सैलरी 15,000 रुपए तक थी। अब इस सीमा को बढ़ाकर 25,000 रुपए कर दिया गया है। नतीजतन, प्राइवेट सेक्टर के बहुत सारे कर्मचारी ईपीएफओ के दायरे में आ जाएंगे और कर्मचारियों की बचत में काफी बढ़ोतरी होगी।
मालूम हो कि मौजूदा 'एम्प्लॉइज प्रोविडेंट फंड्स एंड मिसलेनियस प्रोविजन्स एक्ट, 1952' के तहत, सिर्फ़ 15,000 रुपए या उससे कम बेसिक सैलरी वाले कर्मचारी ही ईपीएफओ के दायरे में आते थे। केंद्र ने अब इसके दायरे को बढ़ाने का ऐलान किया है। केंद्रीय कैबिनेट ने 25,000 रुपए तक की बेसिक सैलरी वाले कर्मचारियों के लिए ईपीएफओ मेंबरशिप अनिवार्य करने का फैसला किया है। इसका मतलब है कि ऑर्गनाइज्ड सेक्टर की ज़्यादातर कंपनियां और लगभग सभी सैलरी ब्रैकेट वाले कर्मचारी ईपीएफओ के दायरे में आ जाएंगे। अभी ईपीएफ के 7.5 करोड़ से ज़्यादा सब्सक्राइबर हैं; यह आंकड़ा लगभग 51 लाख और बढ़ने वाला है।
इस फैसले का एक और बड़ा नतीजा कर्मचारियों की बचत में बढ़ोतरी है। असल बेसिक सैलरी चाहे जो भी हो, पहले ईपीएफओ में योगदान की सीमा अधिकतम 15,000 रुपए की बेसिक सैलरी के आधार पर तय की जाती थी। कर्मचारी इस 15,000 रुपए का 12.5 फीसदी यानी 1,800 फीसदी ईपीएफओ में जमा कर सकते हैं। कंपनी भी इतनी ही रकम जमा करती है। अगर सैलरी की सीमा बढ़ाकर 25,000 रुपए कर दी जाती है, तो यह योगदान बढ़कर 3,200 रुपए हो जाएगा और कंपनी भी उतनी ही रकम जमा करेगी। इससे कर्मचारियों की भविष्य की बचत में काफी बढ़ोतरी होगी, हालांकि उनकी हाथ में आने वाली सैलरी (टेक-होम पे) थोड़ी कम हो सकती है।
सरकारी सूत्रों के मुताबिक, ईपीएफ सैलरी की सीमा आखिरी बार 2014 में बढ़ाई गई थी और पिछले 12 सालों से इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है। इस दौरान सरकारी कर्मचारियों की सैलरी और खर्च, दोनों बढ़े हैं, जिसके चलते सीमा बढ़ाने का फैसला लिया गया है। इस कदम से सरकार पर सालाना 11,339 करोड़ रुपए का खर्च आएगा।
