बंगाल में चुनाव कर्मियों की हिफाजत के लिए हिंदू महासभा ने की केंद्रीय बल तैनात करने की मांग
खटखटाया सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा
निज संवाददाता : अखिल भारतीय हिंदू महासभा ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। संगठन ने जनहित याचिका दायर कर मांग की है कि चुनाव ड्यूटी में लगे सरकारी कर्मचारियों, न्यायिक अधिकारियों और आम नागरिकों की सुरक्षा के लिए केंद्रीय बलों की तैनाती हो।
हिंदू महासभा ने यह याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर की है। इसमें निष्पक्ष, स्वतंत्र और सुरक्षित चुनाव कराने के लिए केंद्र सरकार को आवश्यक कदम उठाने का निर्देश देने की मांग की गई। याचिका में आरोप लगाया गया है कि पश्चिम बंगाल में चुनावी प्रक्रिया के दौरान राजनीतिक रूप से प्रेरित हिंसा, धमकी और उत्पीड़न की घटनाएं होती रही हैं, जिससे चुनाव की निष्पक्षता प्रभावित होती है।
इसमें 2013 के पंचायत चुनावों का हवाला देते हुए कहा गया है कि उस दौरान कथित तौर पर 39 लोगों की हत्या हुई थी और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने बड़ी संख्या में सीटें जीती थीं। वहीं 2018 के पंचायत चुनावों में भी करीब 20 लोगों की हत्या और विपक्षी उम्मीदवारों को नामांकन दाखिल करने से रोकने के आरोप लगाए गए हैं।
याचिका में हाल के घटनाक्रमों का भी जिक्र किया गया है। इसमें नवंबर 2020 में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की ओर से कोयला तस्करी और हवाला मामले में जांच दर्ज करने और जनवरी 2026 में कोलकाता व दिल्ली में छापेमारी का उल्लेख है, जिसमें राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोप लगाए गए। इसके अलावा, मार्च 2026 में नदिया और हुगली जिलों में चुनावी ड्यूटी कर रहे अधिकारियों को घेरने और धमकाने की घटनाओं का हवाला दिया गया है। अप्रैल 2026 में मतदाता सूची पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान न्यायिक अधिकारियों को कई घंटों तक भीड़ की ओर से रोके जाने का भी जिक्र किया गया है।
याचिका में कहा गया है कि इन घटनाओं से स्पष्ट है कि राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति चुनावों के दौरान चुनौतीपूर्ण रहती है। इसलिए केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती और कड़े निर्देशों के जरिए अधिकारियों व मतदाताओं की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए, ताकि चुनाव प्रक्रिया बिना किसी डर, दबाव या हस्तक्षेप के संपन्न हो सके। अपनी याचिका में हिंदू महासभा ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की कि अधिकारियों को यह निर्देश दिए जाएं कि वे न्यायिक अधिकारियों, सरकारी कर्मचारियों और नागरिकों को हिंसा और धमकी से बचाने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएं।
