काकोली घोष दस्तीदार बनी एनसीपीआई की अध्यक्ष
निज संवाददाता : टीएमसी के 20 बागी सांसदों ने दल-बदल विरोधी कानून से बचने के लिए खुद को एनसीपीआई में विलय कर लिया है। इस कदम के साथ ही उन्होंने पार्टी की कमान भी अपने हाथ में ले ली है। काकोली घोष दस्तीदार को एनसीपीआई का नया अध्यक्ष चुना गया है। काकोली को कभी ममता बनर्जी का करीबी माना जाता था। वो अब बागी गुट का प्रमुख चेहरा बनकर उभरी हैं।
एनसीपीआई को जनवरी 2023 में एक राजनीतिक दल के रूप में पंजीकृत किया गया था। चुनाव आयोग के रिकॉर्ड के मुताबिक, इसका पता पश्चिम बंगाल के हावड़ा जिले के संकराइल में दर्ज है। पार्टी ने 2023 त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में चार उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन महज 536 वोटों तक सीमित रहा। फिलहाल एनसीपीआई चुनाव आयोग की 2000 से अधिक गैर-मान्यता प्राप्त पंजीकृत पार्टियों में शामिल है। लेकिन अगर स्पीकर इस विलय को मंजूरी दे देते हैं, तो यह पार्टी लोकसभा में पांचवीं सबसे बड़ी पार्टी बन सकती है। यह पार्टी बीजेपी के बाद एनडीए की दूसरी सबसे बड़ी सहयोगी बन जाएगी।
वहीं इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब बागी सांसदों ने सबसे पहले लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को टीएमसी छोड़ने के अपने फैसले की जानकारी दी। उन्होंने दावा किया कि लोकसभा में पार्टी के कुल 28 सांसदों में से दो-तिहाई से ज्यादा सांसद उनके साथ हैं। इससे दल-बदल विरोधी कानून के तहत उनकी स्थिति मजबूत हो सकती है। हालांकि बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व ने अब तक इस बागी गुट के साथ अपने संबंधों पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया है, लेकिन सूत्रों के मुताबिक पश्चिम बंगाल के नेता शुभेंदु अधिकारी, केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव और सांसद निशिकांत दुबे लगातार बागी सांसदों के संपर्क में रहे। बताया जा रहा है कि इन नेताओं ने बागियों की रणनीति और आगे की राजनीतिक योजना बनाने में अहम भूमिका निभाई।
सूत्रों के अनुसार, बागी सांसदों की कई महत्वपूर्ण बैठकें भूपेंद्र यादव के आवास पर हुईं, जिससे बीजेपी की अप्रत्यक्ष भूमिका और भी स्पष्ट हो गई। आखिरकार रविवार को 20 बागी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष को औपचारिक रूप से सूचित किया कि वे एनसीपीआई में विलय कर रहे हैं और बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए का हिस्सा बनना चाहते हैं। बागी सांसदों ने स्पीकर से यह भी आग्रह किया कि उन्हें सत्ताधारी गठबंधन के भीतर सीटों का आवंटन किया जाए। बता दें कि पिछले संसद सत्र तक यही सांसद विपक्षी खेमे का हिस्सा थे और अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व में टीएमसी के सदस्य के रूप में काम कर रहे थे।
