पोलैंड की लड़की ने बचाई कश्मीर के बच्चे की जान

दुर्लभ बीमारी से पीड़त था 3 साल का मासूम

पोलैंड की लड़की ने बचाई कश्मीर के बच्चे की जान


निज संवाददाता : कश्मीर के गांदरबल जिले के एक 3 साल के मासूम बच्चे की जान पोलैंड की रहने वाली एक लड़की ने बचाई। दरअसल, बच्चे को हीमोफैगोसाइटिक लिम्फोहिस्टियोसाइटोसिस (एचएलएच)  नाम की दुर्लभ बीमारी थी। उसे स्टेम सेल्स यानी बोनमैरो ट्रांसप्लांट की आवश्यकता थी। ऐसे में एक जर्मन संस्था की पहल पर पोलैंड की इस लड़की ने अपना बोनमैरो डोनेट कर कश्मीर के मासूम की जान बचाने में मदद की।
दरअसल, इस बीमारी में शरीर का इम्यून सिस्टम बहुत ज्यादा एक्टिव हो जाता है और अपने ही अंगों और स्वस्थ ब्लड सेल्स पर हमला करता है। इस रोग से लोग जेनेटिक तौर पर भी ग्रसित हो सकता है या फिर इससे बाद में भी पीड़ित हो सकते हैं। सबसे जरूरी बात यह है कि अगर समय रहते इस बीमारी से निपटा नहीं गया तो यह जानलेवा भी हो सकती है। हेमेटोपोएटिक स्टेम सेल ट्रांसप्लांट यानी बोन मैरो ट्रांसप्लांट भी कहते हैं। इसी के जरिए ही इसे ठीक किया जा सकता है।
फिलहाल, कश्मीर के इस 3 साल के मासूम बच्चे की जान बचाई जा चुकी है। पोलैंड की एक लड़की ने उसे अपना स्टेम सेल डोनेट किया। डोनर की पहचान से लेकर बोन मैरो को लाने-ले जाने का काम एक जर्मन संस्था ने किया। इस ट्रांस्पलांट को श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (एसकेआईएमएस)  के डॉक्टरों ने अंजाम दिया।
मुख्य बातें
•    कश्मीर गांदरबल जिले के 3 साल के मासूम को हुई एचएलएच  नाम की जानलेवा दुर्लभ बीमारी।
•    पोलैंड की एक लड़की ने अपना बोन मैरो डोनेट कर बच्चे की जान बचाई।
•    डोनर की पहचान से लेकर बोन मैरो को लाने-ले जाने का काम एक जर्मन संस्था ने किया।
•    श्रीनगर के शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में हुआ बच्चे का बोनमैरो ट्रांसप्लांट।
शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के डायरेक्टर प्रोफेसर अशरफ गनी ने बताया कि ‘जर्मनी की डीकेएमएस रजिस्ट्री के इंटरनेशनल बोन मैरो डोनर नेटवर्क के जरिए सबसे पहले बच्चे के लिए मैचिंग डोनर की पहचान की। फिर पोलैंड में डोनर से लिए गए स्टेम सेल को एसकेआईएमएस लाया गया। यहां कुछ दिन पहले उसे बच्चे के अंदर ट्रांसप्लांट किया गया। लाने ले जाने का पूरा खर्च जर्मन संस्था ने ही उठाया।
उन्होंने आगे कहा कि ‘शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। भारत में बहुत कम सेंटर ही ‘मैच्ड अनरिलेटेड डोनर’ (एमयूडी)  ट्रांसप्लांट करते हैं। हमारे इंस्टीट्यूट में भी यह अपनी तरह का पहला प्रोसीजर है, जिसमें हम सफल रहे है और बच्चे की जान बचाई जा सकी है।
तकरीबन दो साल पहले, जब बच्चा 12 महीने का था तो उसके पिता उसे कमजोरी, वजन कम होने, ब्लड प्लेटलेट्स की संख्या और लिवर के बढ़ने की शिकायत लेकर गांदरबल ज़िले के सफापोरा से एसकेआईएमएस ले आए। उसके पिता का कहना था कि बच्चा इससे पहले बिल्कुल स्वस्थ था। ऐसे में जब चिकित्सकों ने जांच की तो बच्चे को एचएलएच नाम की दुर्लभ बीमारी से ग्रसित होने की जानकारी हुई। बच्चे के पिता तीन साल पहले इसी बीमारी से अपनी बेटी को भी खो चुके थे। ऐसे में यह जानकर, वे बेहद घबरा गए थे।
बच्चे की बीमारी के बारे में जानकारी होने के बाद उसके पिता ने एसकेआईएमएस  की एसोसिएट प्रोफेसर डॉक्टर रेशमा रोशन से संपर्क किया। डॉक्टर रेशमा ने क्लिनिकल हेमेटोलॉजी डिपार्टमेंट के हेड प्रोफेसर सज्जाद अहमद गिलानी और डॉक्टर अफाक अहमद खान के साथ मिलकर बच्चे का इलाज शुरू किया। उन्होंने बताया कि बच्चे के परिवार में कोई मैचिंग डोनर नहीं था। उन्होंने कहा कि अच्छी बात यह रही कि एक डोनर मिल गया और हम एमयूडी ट्रांसप्लांट कर पाए।
डॉक्टर रेशमा ने आगे बताया कि मरीज की हालत स्थिर और अच्छी है। उसकी जांच रिपोर्ट भी नॉर्मल है। उसे 23 जून को अस्पताल से छुट्टी भी दे दी गई है। वहीं, प्रोफेसर सज्जाद अहमद गिलानी ने बताया कि बोन मैरो ट्रांसप्लांट के लिए डोनर आमतौर पर वे सगे भाई-बहन होते हैं जिनका एचएलए पूरी तरह मैच करता है।
उन्होंने बताया कि इस मामले में ट्रांसप्लांटेशन का एक विकल्प और है। माता-पिता से हैप्लोआइडेंटिकल या आधा-मैच करने वाला ट्रांसप्लांट लिया जाए। वहीं, एमयूडी ट्रांसप्लांट तब किया जाता है जब इंटरनेशनल रजिस्ट्री के ज़रिए कोई सही डोनर मिल जाता है। हैप्लोआइडेंटिकल या एमयूडी  ट्रांसप्लांट की तुलना में मैच करने वाले भाई-बहन डोनर के मामले में कॉम्प्लिकेशन का खतरा कम होता है। उन्होंने यह भी कहा कि बोन मैरो स्टेम सेल डोनेट करना आम तौर पर सुरक्षित है। इससे डोनर को कोई नुकसान नहीं होता है।
अपने बच्चे के स्वस्थ होने पर उसके पिता ने खुशी जाहिर करते हुए कहा कि ‘मैं खुश हूं कि मेरा बच्चा ठीक हो गया है। इसके साथ उन्होंने एसकेआईएमएस  में डोनर रजिस्ट्रेशन सुविधा शुरू करने की अपील भी की। साथ ही यह भी कहा कि अस्पताल की इस पहल के लिए वह इसमें रजिस्टर करने वाले पहले व्यक्ति होंगे। इस मसले पर एसकेआईएमएस  के डायरेक्टर प्रोफेसर अशरफ गनी ने कहा कि अगर ऐसी सुविधा शुरू होती है, इसमें ज्यादा लोग रजिस्टर करते हैं और उनके एचएलए प्रोफ़ाइल को डोनर रजिस्ट्री में शामिल किया जाता है, तो वे स्टेम सेल ट्रांसप्लांट की जरूरत वाले मरीजो की जान बचाई जा सकती है।

Tags:

Related Posts

About The Author

Advertisement

Latest News