मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम
कविता
चैत्र शुक्ल की सुनहरी बेला में,
अयोध्या के आँगन में उषा उतरी,
जग ने देखा धर्म का सूर्योदय जब
करुणा की किरण बन राम अवतरे।।
वन-वन में जिसकी गूँज पवित्र,
न्याय की ज्योति जिसने जगाई,
वाणी में मधुर सत्य की धारा,
भुजाओं में मर्यादा समाई।।
शस्त्र नहीं केवल शक्ति बने,
शास्त्रों का भी मान बढ़ाया,
राजा होकर त्याग का पथ चुन,
मानवता को धर्म सिखाया।।
जन-मन में दीपक-सा जलते,
संयम जिनका स्वर्णिम आभूषण,
सीता-सा धैर्य, लक्ष्मण-सी सेवा,
भक्ति बने हनुमत का समर्पण।।
आज भी जब तम घिर आता है,
मन संशय से भर जाता है,
राम-नाम का एक प्रभात
अंतर का अंधकार मिटाता है ।।
नवमी के इस उत्सव पर,
हृदय में मर्यादा जगाएँ,
करुणा,सत्य,शील की ज्योति
जीवन-अयोध्या फिर बसाएँ।।
गोपाल कौशल भोजवाल
बस स्टैंड महू नीमच राजमार्ग फोरलेन
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