मदरसों को खत्म करके बना दें  सेक्युलर स्कूल

तस्लीमा नसरीन ने दिया सुझाव

मदरसों को खत्म करके बना दें  सेक्युलर स्कूल


निज संवाददाता :  बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने कहा कि भारत में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लागू करना जरूरी है ताकि भेदभाव, खासकर महिलाओं के खिलाफ भेदभाव को खत्म किया जा सके। बांग्ला अकादमी में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में तस्लीमा ने खारिजी (गैर-मान्यता प्राप्त) मदरसों को खत्म करने की वकालत की और यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) को लागू करने का समर्थन किया। उन्होंने अपने अनुभवों और नजरिए के आधार पर राज्य की तीन सरकारों, लेफ्ट फ्रंट, तृणमूल और बीजेपी सरकार के बीच के अंतर का भी आकलन किया। उन्होंने कहा कि एक सरकार (लेफ्ट फ्रंट) ने मुझे यहां से निकाल दिया। उसके बाद की सरकार (तृणमूल) ने मुझे वापस नहीं आने दिया। अब मौजूदा सरकार (बीजेपी) मुझे वापस ले आई है। यही अंतर है। उन्होंने उम्मीद जताई कि मौजूदा सरकार अलग राय रखने वालों की अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा करेगी।
दरअसल राज्य सरकार ने हाल ही में खारिजी या गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों को खत्म करने का फैसला किया है और इस प्रक्रिया के लिए जरूरी सर्वे पहले ही शुरू हो चुका है। इसके अलावा सरकार बदलने के बाद बीजेपी के चुनावी घोषणापत्र के अनुसार यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी)  को लागू करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया गया है। तस्लीमा ने इन दोनों मुद्दों पर राज्य सरकार का समर्थन किया है।
खारिजी मदरसों के बारे में उन्होंने कहा कि मैं हमेशा से मदरसों को खत्म करने के पक्ष में रही हूं। बांग्लादेश में मैंने देखा है कि कैसे उनमें जिहादियों को तैयार किया जाता है। वहां बनी कई मस्जिदों में भी ऐसा ही होता है। मदरसे गैर-मुसलमानों के प्रति नफरत सिखाते हैं। अब ऐसी खबरें आ रही हैं कि इन मदरसों में लड़कियों के साथ बलात्कार हो रहा है।
तस्लीमा ने आगे कहा कि मदरसे में पढ़ने के बाद इंसान के पास भीख मांगने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। इसलिए मैं मदरसों को खत्म करने और उनकी जगह धर्मनिरपेक्ष स्कूल स्थापित करने की वकालत करती हूं। असम समेत बीजेपी शासित कई राज्यों में मुख्यधारा के स्कूलों के लिए जगह बनाने के मकसद से मान्यता प्राप्त और गैर-मान्यता प्राप्त दोनों तरह के मदरसों को धीरे-धीरे बंद किया जा चुका है। पश्चिम बंगाल सरकार ने अभी तक इस रास्ते को नहीं अपनाया है। तस्लीमा का मानना है कि एक धर्मनिरपेक्ष राज्य बनने के लिए धर्म को सभी सरकारी या राज्य के मामलों से दूर रखना जरूरी है।
यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी)  को लागू करने के संबंध में बंगाल सरकार की मौजूदा पहल की तारीफ करते हुए तस्लीमा ने कहा कि मैं पिछले 40 सालों से 'एक देश, एक कानून' की वकालत कर रही हूं। मेरा मानना है कि पूरे उपमहाद्वीप भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान में यूसीसी  लागू करने की जरूरत है, क्योंकि धार्मिक कानूनों के तहत महिलाओं को उनके अधिकार नहीं मिल पाते। उन्होंने बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदू महिलाओं को पिता की संपत्ति में उत्तराधिकार का अधिकार न मिलने, हिंदू पुरुषों द्वारा बहुविवाह करने और महिलाओं को तलाक का अधिकार न मिलने जैसे मुद्दों पर जोर दिया। तस्लीमा का यह भी मानना है कि भारत में मुस्लिम महिलाओं को धार्मिक कानूनों के तहत कई तरह के अत्याचार चुपचाप सहने के लिए मजबूर किया जाता है।
तस्लीमा ने बांग्लादेश में राजनीतिक उथल-पुथल, पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के देश छोड़ने और देश में अल्पसंख्यक हिंदुओं, बौद्धों और ईसाइयों के खिलाफ हो रहे अत्याचारों के खिलाफ भी आवाज उठाई। बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार गिराने वाले छात्र आंदोलन का जिक्र करते हुए और दिल्ली के जंतर-मंतर पर 'कॉकरोच जनता पार्टी'  के हालिया विरोध प्रदर्शन में 'जेन जेड' (जेन जी)  की भागीदारी पर टिप्पणी करते हुए तस्लीमा ने कहा कि मुझे भारत में छात्र आंदोलन के बारे में पूरी जानकारी नहीं है। हालांकि मैं छात्रों के हर काम का आंख बंद करके समर्थन नहीं करती। उदाहरण के लिए बांग्लादेश में छात्र आंदोलन ने लोगों को गुमराह किया। यह साफ हो गया कि इसके पीछे कट्टरपंथी और जिहादी थे।
तस्लीमा का मानना है कि बांग्लादेश में हिंदुओं समेत अल्पसंख्यकों को आज भी उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। ठीक वैसे ही जैसे वे पहले करते थे। उनका मानना है कि बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ अत्याचार मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के कार्यकाल में सबसे ज्यादा हुए हैं। साथ ही पूर्व प्रधानमंत्री हसीना की कड़ी आलोचक होने के बावजूद तस्लीमा ने साफ किया कि वह अवामी लीग पर प्रतिबंध लगाने, या उसके नेताओं को जबरदस्ती देश से बाहर भेजने या उनकी हत्या करने का समर्थन नहीं करती हैं। उन्होंने कहा कि अवामी लीग की कड़ी आलोचक होने के नाते भी मैं कहती हूं कि उन पर प्रतिबंध नहीं लगाया जाना चाहिए। लोकतंत्र का दावा करते हुए ऐसे कदम उठाना सही नहीं है। उन्हें (अवामी लीग के नेताओं को) देश लौटने और राजनीति में हिस्सा लेने की इजाजत दी जानी चाहिए।
तस्लीमा ने खुलकर कहा कि उन्हें नहीं लगता कि वह कभी अपने वतन लौट पाएंगी, भले ही हसीना वापस आ जाएं। उनकी बस यही इच्छा है कि वह आने वाले कोलकाता पुस्तक मेले में वैसे ही शामिल हो पाएं,  जैसे पहले हुआ करती थीं।

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