बागबाज़ार सर्वजनिन दुर्गोत्सव और प्रदर्शनी का इतिहास

1938-39 में नेताजी सुभाषचंद्र बोस स्वयं अध्यक्ष बने और सक्रिय रूप से जुड़े।

बागबाज़ार सर्वजनिन दुर्गोत्सव और प्रदर्शनी का इतिहास

निज संवाददाता : बागबाज़ार सर्वजनिन दुर्गोत्सव और प्रदर्शनी का इतिहास लगभग एक शताब्दी से भी अधिक समय से बंगाली संस्कृति और उसकी प्रगति के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। इस लंबे और समृद्ध कालखंड में इसने इतिहास के कई उतार-चढ़ाव और संकटों को देखा है। इस गौरवशाली इतिहास को हम दो हिस्सों में बाँट सकते हैं—पहला काल 1919 से 1930 तक और दूसरा काल 1930 के बाद।

1919 में पहली बार बागबाज़ार के लोगों ने सरकार हाउस, 55 बागबाज़ार स्ट्रीट (नेबुबागान लेन और बागबाज़ार स्ट्रीट के मोड़ पर) में इस दुर्गोत्सव का आयोजन किया। इसका नाम रखा गया था “नेबुबागान बारोयारी दुर्गापूजा”। यहाँ लगातार तीन वर्षों तक पूजा होती रही। 1924 में यह आयोजन बागबाज़ार स्ट्रीट और पशुपति बोस लेन के चौराहे पर हुआ। अगले वर्ष यह कांटापुकुर में आयोजित हुआ और 1927 में बागबाज़ार काली मंदिर प्रांगण में।

1926 में प्रसिद्ध समाजसेवी नागेंद्रनाथ घोषाल के प्रयास से कई विद्वान और प्रतिष्ठित लोग इसमें जुड़े और पूजा एक संगठित रूप ले पाई। संगठन का नाम भी उन्होंने ही दिया। 1929 में पूजा के अवसर पर पहली बार एक प्रदर्शनी का आयोजन किया गया।

1930 में कोलकाता कॉरपोरेशन के एल्डरमैन दुर्गाचरण बंद्योपाध्याय संगठन के अध्यक्ष चुने गए। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन और स्वदेशी विचारधारा से प्रेरित होकर प्रदर्शनी को बड़े स्तर पर आयोजित किया और संगठन का नाम बदलकर रखा—“बागबाज़ार सर्वजनिन दुर्गोत्सव और प्रदर्शनी”। प्रदर्शनी के लिए उन्होंने जिस जगह का चयन किया, वह आज का “दुर्गा नगर” है। उस समय इसे “मेटल यार्ड” कहा जाता था और यह कोलकाता कॉरपोरेशन के सड़क मरम्मत विभाग का गोदाम हुआ करता था। दुर्गाचरण बंद्योपाध्याय ने तत्कालीन मेयर नेताजी सुभाषचंद्र बोस से अनुमति मांगी। नेताजी ने अनुमति दी, कॉरपोरेशन और संगठन के संयुक्त प्रदर्शनी की पहल की और साथ ही 500 रुपये का दान भी दिया।

1930 से ही यहाँ उद्घाटन और समापन समारोह दुर्गोत्सव का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। उद्घाटन आश्विन मास की शुक्ल पंचमी को और समापन लक्ष्मी पूजन के दिन होता है। संतोष कुमार बसु, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, आचार्य प्रफुल्लचंद्र राय, सर हरिशंकर पाल जैसे अनेक गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति ने इस आयोजन को विशेष ऊँचाई दी।

1938-39 में नेताजी सुभाषचंद्र बोस स्वयं अध्यक्ष बने और सक्रिय रूप से जुड़े।

पूजा के अलावा दो और विशेष आयोजन इस उत्सव की पहचान बने—महाअष्टमी की सुबह वीराष्टमी उत्सव और विजयादशमी की सुबह सिंदूर खेला। क्रांतिकारी पुलिन दास, जो अनुषीलन समिति के प्रमुख सदस्य थे, शारीरिक रूप से असमर्थ होने तक नियमित रूप से वीराष्टमी उत्सव में उपस्थित रहते थे।

स्वदेशी आंदोलन से जुड़ने के बाद इस उत्सव का महत्व और बढ़ा। कोलकाता ही नहीं, बल्कि दूर-दराज़ से लोग यहाँ आने लगे और यह उत्सव सचमुच जनता का पर्व बन गया।

90 के दशक के अंत में संगठन ने “मेटल यार्ड” को स्थायी पार्क में बदलने के लिए सरकार से पहल की। कई प्रतिष्ठित लोगों के सहयोग से नये शताब्दी की शुरुआत में यह सपना साकार हुआ। वर्तमान में समिति इस पार्क के रखरखाव की स्वतंत्र जिम्मेदारी लेने के लिए सरकार से बातचीत कर रही है। उम्मीद है कि जल्द ही यह जिम्मेदारी संगठन को मिल जाएगी और यह गौरवशाली परंपरा आगे भी लंबे समय तक बनी रहेगी।

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