विश्वकर्मा पूजा और पतंगबाज़ी
शहर के आकाश से मिटती जा रही परंपरा
उद्योग और कारखानों के देवता विश्वकर्मा की पूजा का अर्थ है एक दिन का उत्सव, भक्ति और आनंद। कभी इस उत्सव की एक प्रमुख परंपरा थी पतंग उड़ाना।
निज संवाददाता : उद्योग और कारखानों के देवता विश्वकर्मा की पूजा का अर्थ है एक दिन का उत्सव, भक्ति और आनंद। कभी इस उत्सव की एक प्रमुख परंपरा थी पतंग उड़ाना। सुबह से ही छतों पर प्रतियोगिता होती—किसकी पतंग आसमान में टिकेगी, किसकी पतंग काटी जाएगी—इस उत्साह की कोई सीमा नहीं होती थी।
लेकिन समय बदल गया है। आज शहर का आसमान अब रंग-बिरंगी पतंगों से नहीं भरता। वर्तमान पीढ़ी के लड़के-लड़कियों में पतंग उड़ाने की रुचि लगभग नहीं के बराबर रह गई है। मोबाइल फोन, टीवी, ऑनलाइन खेलों का नशा, शहर की ऊंची इमारतें, छतों की सीमाएं और सुरक्षा संबंधी कारणों से यह पारंपरिक खेल धीरे-धीरे लुप्त होता जा रहा है।
इसका गहरा संकट झेल रहे हैं पतंग कलाकार और व्यापारी। कभी शोभावाज़ार, बागबाज़ार, हावड़ा या सियालदह की गलियों में विश्वकर्मा पूजा से पहले पतंग की दुकानों पर भीड़ लगी रहती थी। अब वे दुकानें लगभग गायब हो गई हैं। बहुत से कारीगर मजबूर होकर अपना पेशा बदल चुके हैं।
पतंग उड़ाना केवल मनोरंजन का साधन ही नहीं, बल्कि बंगाल की एक अनमोल लोक परंपरा है। इस परंपरा को बचाए रखने के लिए बच्चों और किशोरों में फिर से रुचि जगानी होगी। वरना विश्वकर्मा पूजा से जुड़ी यह रंगीन खुशी इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए खो जाएगी।
