जानिए भगवान जीमूतवाहन कौन थे, जितिया व्रत में उनकी पूजा क्यों की जाती है।
पढ़ें जीमूतवाहन और शंखचूड़ से जुड़ी पौराणिक कथा।
हिंदू धर्म में संतान की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए कई व्रत किए जाते हैं। इन्हीं में से एक जितिया व्रत है, जिसे जीवित्पुत्रिका व्रत भी कहा जाता है। मान्यता के अनुसार, माताएं अपनी संतान की लंबी आयु और उनकी सुरक्षा की कामना से यह व्रत रखती हैं।
जितिया व्रत से जुड़ी धार्मिक परंपरा में भगवान जीमूतवाहन की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। इसके अलावा सूर्य नारायण और माता जगदंबा यानी देवी पार्वती की पूजा का भी विधान बताया गया है।
यह व्रत तीन दिनों तक चलने वाली परंपरा से जुड़ा है। मान्यता के अनुसार, व्रत के दूसरे दिन महिलाएं पूरे दिन और रात निर्जला उपवास करती हैं।
लेकिन सवाल यह है कि आखिर भगवान जीमूतवाहन कौन थे और उनकी पूजा जितिया व्रत से क्यों जुड़ी है?
कौन थे भगवान जीमूतवाहन?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, जीमूतवाहन एक दयालु, धर्मात्मा और परोपकारी गंधर्व राजकुमार थे। उन्हें त्याग और दूसरों के प्राणों की रक्षा के लिए अपना जीवन तक दांव पर लगाने वाले चरित्र के रूप में याद किया जाता है।
कथा के अनुसार, जीमूतवाहन गंधर्वराज जीमूतकेतु के पुत्र थे। उनका मन राज-पाट और सांसारिक सुखों में नहीं लगा। उन्होंने राजसी जीवन छोड़कर अपने माता-पिता की सेवा के लिए वन में रहने का निर्णय लिया।
जीमूतवाहन का विवाह मलयवती नाम की कन्या से हुआ था। इसके बाद भी उनका जीवन त्याग और परोपकार की भावना से जुड़ा रहा।
गरुड़ और नागों के बीच क्या हुआ था?
पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय गरुड़ और नागों के बीच समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत नाग प्रतिदिन एक नाग को गरुड़ के आहार के रूप में भेजते थे।
एक दिन शंखचूड़ नामक नाग की बारी आई। शंखचूड़ की वृद्ध मां अपने पुत्र को गरुड़ के आहार के लिए जाते देखकर विलाप करने लगीं।
उनकी पीड़ा देखकर जीमूतवाहन का हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने एक निर्दोष नाग की जान बचाने का फैसला किया।
शंखचूड़ की जगह खुद वध शिला पर लेट गए जीमूतवाहन
जीमूतवाहन ने शंखचूड़ को बचाने के लिए स्वयं को गरुड़ के सामने प्रस्तुत करने का निर्णय लिया। कथा के अनुसार, उन्होंने लाल वस्त्र धारण किया और वध शिला पर जाकर लेट गए।
गरुड़ ने उन्हें नाग समझकर अपने पंजों में पकड़ लिया और अपने साथ ले जाने लगे। इस दौरान जीमूतवाहन ने अपनी पहचान या उद्देश्य को लेकर कोई भय नहीं दिखाया।
बाद में जब गरुड़ को पता चला कि यह नाग नहीं बल्कि जीमूतवाहन हैं, जिन्होंने एक नाग की जान बचाने के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने का निर्णय लिया है, तो वे उनके त्याग से प्रभावित हुए।
जीमूतवाहन के त्याग से प्रसन्न हुए गरुड़
जीमूतवाहन के त्याग और परोपकार से गरुड़ अत्यंत प्रभावित हुए। कथा के अनुसार, उन्हें अपने किए पर लज्जा हुई और उन्होंने जीमूतवाहन की इच्छा के अनुसार नागों की रक्षा करने का संकल्प लिया।
गरुड़ ने भविष्य में नागों का शिकार न करने की प्रतिज्ञा ली। इस तरह जीमूतवाहन ने अपने प्राणों की परवाह किए बिना एक नाग और उसके परिवार को बचाया।
जितिया व्रत से कैसे जुड़ा जीमूतवाहन का नाम?
जीमूतवाहन की कथा में त्याग, संतान की रक्षा और जीवन की मंगलकामना का भाव प्रमुख रूप से दिखाई देता है। इसी कारण धार्मिक परंपरा में उनका संबंध जितिया या जीवित्पुत्रिका व्रत से जोड़ा जाता है।
मान्यता है कि माताएं जिस भावना से अपनी संतान की लंबी उम्र और सुरक्षा के लिए जितिया व्रत करती हैं, उसमें जीमूतवाहन के त्याग और परोपकार की कथा का विशेष महत्व है।
इसी वजह से जितिया व्रत के दिन भगवान जीमूतवाहन का स्मरण और पूजन किया जाता है। हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों में इस व्रत से जुड़ी पूजा-पद्धति और लोक परंपराओं में कुछ अंतर भी देखने को मिलता है।
