आंवला नवमी, जिसे अक्षय नवमी भी कहा जाता है,

अक्षय नवमी के दिन ही सत्ययुग का आरम्भ हुआ था।

आंवला नवमी, जिसे अक्षय नवमी भी कहा जाता है,

हिन्दु कैलेण्डर के अनुसार अक्षय नवमी का पर्व कार्तिक शुक्ल नवमी के दिन मनाया जाता है। यह पर्व देवउठनी एकादशी से दो दिन पूर्व मनाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि, अक्षय नवमी के दिन ही सत्ययुग का आरम्भ हुआ था। अक्षय नवमी को सत्य युगादि के नाम से भी जाना जाता है तथा यह दिन समस्त प्रकार के दान-पुण्य सम्बन्धित कार्यों के लिये बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। जैसा कि अक्षय नाम से पता चलता है, इस दिन कोई भी दान या भक्ति सम्बधी कार्य करने करने से उसका पुण्यफल कभी कम नहीं होता तथा व्यक्ति को न केवल इस जन्म में अपितु आगामी जन्मों में भी उसका पुण्यफल प्राप्त होता है।

अक्षय नवमी का दिन भी अक्षय तृतीया के सामान ही अत्यन्त महत्वपूर्ण है। अक्षय तृतीया त्रेता युगादी है एवं अक्षय नवमी सत्य युगादी है। अक्षय तृतीया के दिन ही चार युगों में से एक त्रेतायुग का आरम्भ हुआ था।

अक्षय नवमी के शुभ अवसर पर मथुरा-वृन्दावन की परिक्रमा का अत्यधिक महत्व है। सत्य युगादि के पावन दिन पर अक्षय पुण्य अर्जित करने हेतु हजारों भक्त मथुरा-वृन्दावन की परिक्रमा करते हैं।

अक्षय नवमी के दिन को आँवला नवमी के नाम से भी जाना जाता है। परम्परागत रूप से अक्षय नवमी के शुभ दिन पर आँवले के वृक्ष की पूजा की जाती है। यही त्यौहार पश्चिम बंगाल में जगद्धात्री पूजा के रूप में मनाया जाता है, जिसके अन्तर्गत सत्ता की देवी, जगद्धात्री की पूजा की जाती है।

आंवला नवमी की पौराणिक कथा

एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार माता लक्ष्मी पृथ्वी का भ्रमण कर रही थीं और उन्हें भगवान विष्णु और शिव की एक साथ पूजा करने की इच्छा हुई। उन्हें स्मरण हुआ कि तुलसी (जो विष्णु को प्रिय है) और बेलपत्र (जो शिव को प्रिय है) के गुण एक साथ आंवले में पाए जाते हैं। तब उन्होंने आंवले के वृक्ष को विष्णु और शिव का प्रतीक मानकर उसकी पूजा की। जब पूजा पूरी हुई, तो भगवान विष्णु और शिव प्रकट हुए। तभी से आंवला नवमी की शुरुआत हुई।
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