ड्राफ्ट लिस्ट में सबसे ज्यादा नाम कोलकाता व आसपास के इलाकों से कटे
ये क्षेत्र लंबे समय से रहे हैं टीएमसी गढ़
निज संवाददाता : बंगाल में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर ) प्रक्रिया के तहत तैयार ड्राफ्ट मतदाता सूची में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। कोलकाता और उसके आसपास के वे विधानसभा क्षेत्र जिन्हें लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है, वहां ‘अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और डुप्लीकेट’ श्रेणी के तहत सबसे अधिक मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। उत्तर कोलकाता की जोड़ासांको और चौरंगी विधानसभा सीटों में एएसडीडी श्रेणी के तहत सबसे ज्यादा नाम कटने का मामला सामने आया है। जोड़ासांको में करीब 72,899 मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं, जो कुल मतदाताओं का लगभग 36.85 फीसद है। वहीं चौरंगी में 74,510 वोटरों के नाम सूची से हटे हैं, जो करीब 35.44 फीसद बैठता है। ये दोनों सीटें लंबे समय से टीएमसी के कब्जे में रही हैं।
सिर्फ उत्तर कोलकाता ही नहीं, बल्कि कोलकाता दक्षिण और हावड़ा जैसे क्षेत्रों में भी बड़ी संख्या में एएसडीडी मतदाता पाए गए हैं। हावड़ा उत्तर विधानसभा क्षेत्र में 60,436 वोटरों (26.96 फीसद) के नाम हटाए गए। कोलकाता पोर्ट सीट पर यह आंकड़ा 63,717 (26.17 फीसद) रहा, जबकि बालीगंज में 65,165 वोटर (25.54 फीसद) एएसडीडी श्रेणी में दर्ज किए गए। इसके अलावा श्यामपुकुर, काशीपुर-बेलगछिया और बेलेघाटा जैसे इलाके भी इस सूची में शामिल हैं, जहां 22 से 24 फीसद तक मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। ये सभी क्षेत्र तृणमूल कांग्रेस के परंपरागत मजबूत इलाके माने जाते हैं।
इसके उलट, राज्य के कुछ जिलों में एएसडीडी मतदाताओं की संख्या काफी कम पाई गई है। बांकुड़ा जिले की कतुलपुर विधानसभा सीट पर केवल 5,678 मतदाता (करीब 2.21 फीसद) इस श्रेणी में आए हैं। इसी तरह पूर्व मेदिनीपुर जिले की नंदकुमार सीट पर 6,651 मतदाता (2.46 फीसद) एएसडीडी के तहत दर्ज किए गए, जो राज्य में सबसे कम आंकड़ों में शामिल हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महानगर और उसके आसपास के इलाकों में इस तरह के आंकड़े सामने आने के पीछे कई सामाजिक और प्रशासनिक कारण हो सकते हैं।
वरिष्ठ कंप्यूटर वैज्ञानिक और राजनीतिक विश्लेषक शुभमय मैत्रा के अनुसार, कोलकाता उत्तर और दक्षिण के इलाकों में मृत या स्थायी रूप से स्थानांतरित हो चुके मतदाताओं की संख्या अन्य जिलों की तुलना में ज्यादा है। उनका कहना है कि शहरी क्षेत्रों में मृत्यु पंजीकरण की प्रक्रिया अपेक्षाकृत बेहतर और नियमित होती है, जिससे ऐसे मामलों की पहचान ज्यादा सटीक तरीके से हो पाती है। उन्होंने यह भी बताया कि आर्थिक कारणों और रोजगार की तलाश में बड़ी संख्या में लोग कोलकाता जैसे महानगरों में आते हैं। समय के साथ इनमें से कई लोग दूसरे शहरों या राज्यों में स्थायी रूप से बस जाते हैं, लेकिन उनके नाम मतदाता सूची में बने रहते हैं। एसआईआर प्रक्रिया के दौरान ऐसे मतदाताओं की पहचान कर उनके नाम हटाए जा रहे हैं।
