"गुप्तिपाड़ा: पहली बारवारी दुर्गा पूजा से जन्मी सामूहिक परंपरा"
गुप्तिपाड़ा : बंगाल की पहली बारवारी दुर्गा पूजा
निज संवाददाता : बंगाल की दुर्गा पूजा आज विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त उत्सव है। यूनेस्को की सांस्कृतिक धरोहर की सूची में इस पूजा का नाम शामिल हो चुका है। लेकिन इसकी जड़ें तलाशने जाएं तो पहुंचना होगा हुगली के गुप्तिपाड़ा में। इतिहास गवाही देता है, इसी गाँव में जन्मी थी बंगाल की पहली बारवारी दुर्गा पूजा।
अठारहवीं शताब्दी के अंतिम दौर में, ज़मींदारों के घरों की भव्य दुर्गा पूजा आम लोगों की पहुँच से बाहर थी। तभी गुप्तिपाड़ा के बारह युवकों ने मिलकर पहल की, ताकि गाँव के प्रत्येक व्यक्ति समान रूप से इस आनंद में भाग ले सके। ‘बारो-यारी’ शब्द से ही निकला बारवारी पूजा—जहाँ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि समाज सामूहिक रूप से आयोजन करता है।
गुप्तिपाड़ा की इस पहल में केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं था, बल्कि इसके भीतर था सामाजिक समानता का बीज। सबने मिलकर चंदा जुटाया, प्रतिमा गढ़ी, आयोजन किया—यह एक नए लोकतांत्रिक दृष्टांत की शुरुआत थी। ज़मींदारों के ठाट-बाट से हटकर यहाँ लोगों ने पाया अपनी पूजा, अपना आनंद।
आज कोलकाता सहित पूरे बंगाल में जो सार्वजनीन दुर्गोत्सव की धारा बह रही है—उसकी जड़ें गुप्तिपाड़ा की इसी पहली बारवारी पूजा से जुड़ी हैं। थीम-पंडाल, आलोक-सज्जा, कला-प्रदर्शन—सबका आधार है वही पहली सामूहिक कोशिश।
गुप्तिपाड़ा के लोग आज भी गर्व के साथ याद करते हैं अपने पूर्वजों की इस पहल को। दुर्गोत्सव अब केवल देवी की आराधना नहीं, बल्कि एक सामाजिक उत्सव, मिलन-मेला और सृजनशीलता का मंच है। और इसकी शुरुआत हुई थी हुगली के उस छोटे से गाँव से।
गुप्तिपाड़ा की पहली बारवारी दुर्गा पूजा केवल बंगाल की पूजा-इतिहास ही नहीं, बल्कि यह सामाजिक एकता, समानता और सहभागिता का शाश्वत प्रतीक है।
